Thursday, March 8, 2012

मृग मारीचिका

आँखों का धोखा,
जिसे मंजिल
समझने की भूल,
अक्सर कर जाते है,
ठोकर लगनी होती है जहाँ ,
चाह कर भी नहीं संभल पाते है.
लड़खड़ाते है,
गिरते है ,
और
फिर उठ कर चल देते है .
यंत्रवत,
उसी राह पर ,
बंद होठो की पीड़ा 
और दर्द ,
स्वयं ही विसर्जित कर ,
जैसे जो कुछ हुआ
वह कुछ नया नहीं है ,
भुला देते है ,
जल्द ही बड़ी से बड़ी ठोकर ,
और दर्द का अहसास ,
और ,
फिर भटकने लगते है ,
नयी मरीचकाओं के बीच .........

****** शिव प्रकाश मिश्र **********

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