धन्यवाद
— शिव प्रकाश मिश्रा
बहुत कृतज्ञता और विनम्रता से,
मन की ऊँचाइयों और दिल की गहराइयों से,
हमारा प्रथम धन्यवाद... उन व्यक्तियों को,
जिन्होंने हमें जीवन दिया!
और हमारे माता-पिता बनने का दायित्व ग्रहण किया,
संतान बनने का सौभाग्य हमें दिया।
रिश्तों का बोध दिलाया,
माँ की महानता और बाप की विशालता का अहसास कराया,
पालन-पोषण किया, वह सब कुछ दिया,
मेरे विचार में जो चाहिए था—
एक अबोध, अजनबी, अनजान को इस संसार में।
ममता, प्यार, दुलार, भाषा और संस्कार,
मानव मूल्य, शिक्षा और सुविचार,
और दिया पूरा घर-संसार!
धन्यवाद! हमारे पितामहों, प्रपितामहों और पूर्वजों को,
जिनके अंश हैं हमारी संरचना में,
और रोम-रोम में हैं साकार—उनके वैज्ञानिक आविष्कार!
विकास के प्रयासों की आधारशिला,
जीवन के सूत्र और जीने की कला,
शक्ति, सामर्थ्य और ईश्वर में आस्था,
प्रकृति से संबंध और धार्मिक व्यवस्था।
उनकी सनातन परंपरा अक्षुण्ण और ज्वलंत है,
जो आज भी हम सबके अंदर जीवंत है...
धन्यवाद! परमात्मा का, ईश्वर का,
या उस अदृश्य शक्ति का, जिसने हमें वह सब कुछ दिया,
जो कल्पना से परे है!
ये गंगा-सी निर्मल, पावन नदियाँ,
मनमोहक, मनोरम, स्वर्ग-सम वादियाँ,
ये बादल, ये झरने, ये असीमित आसमान,
ये हिमालय-से पर्वत, ये मरुस्थल और रेगिस्तान!
ये सर्दी, गर्मी, वर्षा और बसंत,
ये फल, फूल, पत्ते और अनंत।
ये सूर्य की रोशनी और चंदा की चाँदनी,
ये सितारों का उपवन जैसे झिलमिल छावनी!
ये मनमोहक छटाएँ,
मलयागिरि से आतीं सुंदर सुरभि हवाएँ,
और सावन की घटाएँ।
ये फूलों से पटी घाटियाँ, फलों से लदी डालियाँ,
ये जड़ी-बूटी और वनस्पतियाँ,
ये अनोखे, दुर्लभ जीव-जंतु, अनगिनत खनिज, अनमोल रत्न!
ये कृषि और लहलहाती फसलें,
कहने को हम कुछ भी कह लें,
पर माँ की तरह सबका पालन करती है यह धरती माता,
और अपने आँचल में धारण करती है—
पर्वत की ऊँचाई और सागर की गहराई,
हमारे लिए, हम सबके लिए, और समूची मानवता के लिए!
बहुत-बहुत धन्यवाद माँ, इस सबके लिए...
काश! सबको हो इसका अहसास,
कि कितना कुछ है ख़ास... हम सबके पास!
पर हम भटकते हैं मृग की तरह,
उन कामनाओं के लिए, जीवन में जिनका कोई अंत नहीं,
खोजते हैं तृष्णा के रास्ते, और होते संतुष्ट नहीं!
शोक करते हैं उसके लिए, जो नहीं होता हमारे लिए निर्धारित,
क्यों बनते हैं हम कृतघ्न, अशिष्ट और अमर्यादित?
धन्यवाद भी नहीं देते उसको,
जिसने इतना कुछ दिया है और बदले में कुछ भी नहीं लिया है!
भूख का महत्व हो सकता है जीने के लिए,
पर जीवन क्यों अपरिहार्य हो... सिर्फ़ पेट भरने के लिए?
हमें सीखना चाहिए, जो है उसमें खुश रहना चाहिए,
जो मिला है, पर्याप्त भले न हो, पर कम नहीं है—मानना चाहिए।
हम पूर्ण संतुष्ट भले न हों, पर जो भी मिला है,
उसके लिए... धन्यवाद तो देना चाहिए!
~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~`