विस्मित मुस्कान हो,
लाल आसमान हो,
पलकें उठें झुकें,
लब थर-थराएँ रुकें ,
पास तुम बैठी रहो,
लहराती आंचल. II1II
गुल मोहर खिले कहीं
दो पल मिलें कहीं
और एक साथ गिनें
हृदय की धडकनें
चांदनी ढके रहे
छोटा सा बादल.. II2II
****शिव प्रकाश मिश्र ******
( मूल कृति जुलाई १९८०)
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