आँखों का धोखा,
मंज़िल समझने की भूल,
जिसे अक्सर लोग कर जाते हैं।
ठोकर लगनी होती है जहाँ,
चाहकर भी वहाँ संभल नहीं पाते हैं।
लड़खड़ाते हैं, गिरते हैं,
और फिर उठकर चल देते हैं— यंत्रवत,
उसी पुरानी राह पर!
बंद होंठों की पीड़ा और दर्द को स्वयं में ही आत्मसात् कर,
जैसे जो कुछ हुआ,
वह कुछ नया नहीं था।
भुला देते हैं जल्द ही बड़ी से बड़ी ठोकर,
और उस तीव्र पीड़ा का एहसास भी...
और फिर निकल पड़ते हैं भटकने,
नई मरीचिकाओं के बीच!