Sunday, March 9, 2025

तुम्हारी हंसी...



है फूलों-सी नाज़ुक तुम्हारी हँसी,

 कितनी प्यारी दुलारी तुम्हारी हँसी।

ज़िन्दगी धूप में तप रही रेत है,

 प्यार की छाँव देती तुम्हारी हँसी।

कोई सावन कहीं झूम के आ गया,

 है फुहार-सी झरती तुम्हारी हँसी।

मन पपीहा-सा व्याकुल फिरे घूमता,

 है स्वाति की बूँद तुम्हारी हँसी।

चाँद बादल में जाने कहाँ जा छिपा, 

है सितारों का उपवन तुम्हारी हँसी।

एक उफनती नदी तोड़ बंधन चली,

 मोहक झरने बनाती तुम्हारी हँसी।

मोर जंगल में नाचे प्रकृति खिल उठे, 

और घुँघरू बजाती तुम्हारी हँसी।

मृग बन मन भटक ढूँढ़ता फिर रहा, 

कोष कस्तूरी का है तुम्हारी हँसी।

सुर्ख जोड़ा पहन एक दुल्हन सजी, 

कंगनों-सी खनकती तुम्हारी हँसी।

एक तूफ़ान आकर कहीं थम गया, 

शोख़ बिजली गिराती तुम्हारी हँसी।

शब्द होंठों पे आयें न आया करें, 

मूक आमंत्रण देती तुम्हारी हँसी।

दिल की अमराइयों में बसंत आ गया

कूक कोयल की मीठी तुम्हारी हँसी।

तुम रहो न रहो ये रहेगी हँसी, 

रोज़ मुझको रुलाती तुम्हारी हँसी।


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--शिव प्रकाश मिश्र

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2 comments:

  1. बहुत अच्छी कविता है।आप अपनी कविता की प्रति भेजें मैं उसे अपने वेबसाइट पर समीक्षा दूंगा।आप भी हमारे बलॉगरhttp://newwebearnnings.blogspot.com पर अपना कमेंट करें।मेरा पता रतिकांत सुमन मकान न-३०वार्ड न-२९ वर्मा मेडिकल हॉल चित्रगुप्त नगर सहरसा बिहार ८५२२०१ मोबा-८००२१७०५७५ धन्यवाद।

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