सर्दियों-सा इश्क़ हमारा
सर्दियों-सा इश्क़ हमारा,
ढूंढ़ता है प्यार की वही गुनगुनी धूप।
चहकता, इठलाता, इतराता यौवन,
पहाड़ी के उस छोर पर...
जहाँ सूरज के साथ प्रेम की पहली किरण फूटी थी,
और पल्लवित हुआ था रिश्तों का एक नया संसार।
हाथों में हाथ थामे,
हमने बुने थे कितने ही सुनहरे ख़्वाब,
जैसे कोहरे की ओट में छिपा हो
कोई अनकहा, मुकम्मल सा जवाब।
जीवन का इन्द्रधनुष यहीं उगा था,
और यहीं से शुरू हुई थी, एक कहानी...
कब चले, कहाँ चले, कितना चले, पता नहीं,
पर नहीं ठिठके, नहीं ठहरे, वक़्त की बर्फबारी में भी,
हम बस एक-दूसरे के साए में साथ चलते रहे।
फिर हुआ क्यों वह,
नहीं स्वीकार था जो, जो किसी को भी...
एक झोंका आया और सब कुछ ले गया,
हाथों में बस यादों का धुआँ रह गया।
वह मोड़, जिसने मंजिलों के रास्ते बदल दिए,
हँसती हुई बहारों के रुख बदल दिए।
मैं वहीं हूँ, मैं वही हूँ,
वही हवाएँ हैं, वही फ़िज़ाएँ हैं,
और वही सर्द सुबह भी है...
कमी है तो बस तुम्हारी, और तुम्हारे साथ की!
ये सूनी वादियाँ अब तुम्हारा नाम पुकारती हैं,
ये सर्द हवाएँ मुझे नहीं, अब मेरी रूह कंपाती हैं।
लगता है तुम यहीं हो,
यहीं कहीं हो...
किसी दरख्त के पीछे, या इस कोहरे के पार,
शायद मुस्कुरा कर मुझे देख रहे हो एक बार।
जबकि मैं स्वयं इस कड़वे सच का साक्ष्य हूँ
कि तुम अब नहीं हो,
कहीं नहीं हो...
बस एक ख़ामोश सन्नाटा है जो चीखता है,
और मेरा यह सर्दियों-सा इश्क़,
अब सिर्फ यादों की आंच पर सुलगता है।
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