— शिव प्रकाश मिश्रा
मन भटकता है रह-रहकर,
कभी यहाँ, कभी वहाँ,
पता नहीं कब? कब? कहाँ? कहाँ?
बचपन... और अपने गाँव की नदी के किनारे...
घूमते थे जहाँ शाम-सवेरे,
और दोस्तों के साथ खेलते थे।
प्यास लगने पर नदी का पानी पीते थे—
कभी शेर बनकर,
कभी मछली बनकर,
तो कभी चुल्लू लगाकर!
नहाते थे दिन में कई-कई बार,
छूने, पकड़ने और छिपने के कितने ही खेल खेलते थे।
नदी के पानी में खूब लोटते थे,
नदी की गोद में फैली बालू में नंगे पाँव चलते थे,
छप-छप करते थे उथले पानी में।
कितने पिरामिड खड़े किए बालू में,
और कितनी ही आकृतियाँ बनाईं!
कितने ही चींटी-चींटों को काग़ज़ की नाव पर नदी की सैर कराई।
कितने ही जल-युद्ध होते थे,
पानी के थपेड़ों से, एक-दूसरे से सराबोर होते थे हम सभी।
तैरने की प्रतियोगिताएँ भी होती थीं कभी-कभी,
जीतते थे, हारते थे, पर कभी नहीं थकते थे।
कितने ही खज़ाने ढूँढ़ते थे हम सब मिलकर—
गोताखोर बनकर, डुबकी लगा-लगाकर!
सीपी, शंख, रंगीन सुंदर पत्थरों के टुकड़े,
और कुछ पुराने सिक्के मुड़े-तुड़े...
आज भी मेरे पास अमानत हैं,
जो नदी से मेरे बचपन के रिश्ते की विरासत हैं।
ये हर चीज़ करती है ख़ुद-बयानी,
उस नदी की अनोखी, अनकही कहानी!
जब बाढ़ आती थी, लगता था जैसे—
हम समुद्र के किनारे बस जाते थे।
पानी की हिंसक लहरें और आर्तनाद करते भँवर,
दिल में अनगिनत उतार-चढ़ाव और कौतूहल भर जाते थे।
हर रोज़ हम बाढ़ नापते थे,
और सरकंडे गाड़कर बाढ़ रोकते थे।
हम इसमें सफल होते थे, ऐसा मानकर बहुत खुश होते थे।
पुल नहीं था, पर गाँव में किसी को इसका ग़म नहीं था,
निकसन काका की नाव शायद इसीलिए बनी थी,
जो ज़रूरतों की अकेली रोशनी थी।
पैदल हों या साइकिल, बकरी हो या भेड़, सबको इसकी ज़रूरत थी।
एक अटूट रिश्ते से हम सब जुड़े थे, अपने गाँव की इस सुंदर नदी से!
कई दशक बाद आज मैं लौटा हूँ उसी नदी के किनारे,
और ढूँढ़ रहा हूँ अपने अतीत के रिश्ते की वह कड़ी,
जिसकी नींव थी कभी यहीं पड़ी।
कभी सोचा भी न था कि समय की सुई इतना घूम जाएगी,
कि इस रिश्ते की जान पर बन आएगी!
मेरे बचपन की यह दोस्त, यह जीवन-धारा,
कृशकाय हो रही है, मलिन हो बीमार हो रही है,
और सूख रही है जगह-जगह से...
शायद आख़िरी कड़ी भी टूट रही है
इस रिश्ते की— इससे... हम सबसे...!