Monday, June 17, 2019

बारिश की गुजारिश



ऐ उड़ते हुए काले बादल...

ऐ उड़ते हुए काले बादल, इतनी मेहरबानी करना,

पहले जाकर मेरे गाँव में, बारिश करना।

दर्द और खुशियों का साथी रहा, मेरा वह कच्चा मकान,

पहले जाकर उसे मेरा, प्रणाम कह देना।

गिर न जाए कहीं मेरे बिना, गश खाकर इस बारिश में,

उसकी उम्र का थोड़ा, लिहाज़ कर देना।

किश्तियाँ कागज़ की, मेरे हाथों से बनीं,

होंगी इस पार या उस पार कहीं, मेरी यादों में सनीं।

ढूँढना मेरी निगाहों से, उसी हसरत से उन्हें चुन लेना,

 फिर मेरे हाथों से, मेरे चौपाल में तैरा देना।

मेरे बगीचे में बचे होंगे, अब सिर्फ़ बांस और बबूल,

जो भी हों, सबको सलीके से नहला देना।

गाय बाँधी थी नीम के नीचे, खुले मौसम में मैंने,

भीग न जाए कहीं, उसे भी छप्पर में बँधवा देना।

एक गौरैया भी रहती है, मेरे घर-आँगन में,

भूखी रह  जाए न  इस बारिश में, कुछ दाने वहाँ डलवा देना।

मंदिर के चबूतरे पर, मेरे दोस्त लोटते होंगे,

प्रेम से खूब भिगोना उन्हें, मैं न आऊँगा, फिर  बतला देना।

जश्ने-बारिश मनाएँगे सब, किसी बगीचे में,

आम आँधी के, अब नसीब में नहीं मेरे, 
मेरा हिस्सा भी वहीं बँटवा देना... 
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                                 - शिव प्रकाश मिश्रा 
                                   मुम्बई, १७.०६.२०१९ 
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