Showing posts with label रिश्ता… टूट रहा …!. Show all posts
Showing posts with label रिश्ता… टूट रहा …!. Show all posts

Monday, June 22, 2026

रिश्ता… टूट रहा …!

 

 रिश्ता… टूट रहा …!

गीतकार : शिव प्रकाश मिश्रा


मन भटकता है रह-रहकर, जाने कहाँ, जाने कहाँ,

 यादों की उस नदी किनारे, खींच रहा बचपन वहाँ।

 अटूट रिश्ता था जो उससे, आज टूटता-सा लगता है,

 मेरे गाँव की प्यारी नदी का, दिल रूठता-सा लगता है॥1

 


शाम-सवेरे दौड़ा करते, जिसके तट पर हम मतवाले,

 हँसी-खुशी के रंग बिखरते, दिन थे कितने भोले-भाले।

 प्यास लगे तो जल पी लेते, चुल्लू भर या डुबकी खाकर,

 कभी शेर बन दहाड़ लगाते, कभी मछली बन इतराकर।

 छप-छप करते उथले जल में, बालू पर लिखते अफ़साने,

 आज भी मन में गूँज रहे हैं, बचपन वाले वे तराने॥2



रेती पर हम महल बनाते, कागज़ की नावें तैराते,

 चींटी-चींटों को बैठाकर, नदी-सैर हम करवाते।

 सीपी, शंख, रंगीन पत्थर, ढूँढ़-ढूँढ़ कर घर ले आते,

 मिट्टी की उन छोटी खुशियों को, दिल में अपने सदा सजाते।

 कुछ सिक्के अब भी हैं पास, यादों की सौगात बनाकर,

 नदी और मेरे बचपन का, रिश्ता रखते हैं सँजोकर॥3



जब-जब ऊंची बाढ़ें आतीं, लगता सागर घर आया है,

 लहरों के चंचल रेले ने, मन में नव-उमंग जगाया है।

 सरकंडों की छोटी चौकी, हम बाढ़ रोकने को गाड़ें,

 बच्चों वाली ज़िद से अपनी, खुशियों के हम दीप जलाएँ।

 पुल न था फिर भी गाँव हमारा, कभी किसी से कम न था,

 निकसन काका की वह नैया, सबकी उम्मीदों का दम था॥4



बरसों बाद आज लौटा हूँ, उसी पुराने तट की ओर,

 ढूँढ़ रहा हूँ बीते कल को, थामे यादों की मीठी डोर।

 पर जो देखा, मन भर आया, एक गहरा दुख दे गया,

 जीवन देने वाली नदी को, समय यह क्या से क्या कर गया!

 मलिन हुई, कमजोर हुई है, सूखी-सूखी साँसें हैं,

 टूटने लगीं अब इस तट पर, जीवन की सब आशाएँ हैं॥5

 


धीरे-धीरे मुझसे कहती, मेरी बचपन वाली साथी—

 "थक गई हूँ, सूख रही हूँ, सुन लो मेरी व्यथा ज़रा-सी।

 मुझको फिर से जीवन दे दो, मुझको फिर से बहने दो,

 अपने बच्चों के सपनों में, मुझको फिर से रहने दो।"

 अटूट रिश्ता था जो मुझसे, मत टूटने दो उसे पुकारो,

 नदियाँ बचेंगी तो बचेगा, यह संसार हमारा, यारों॥6


मन भटकता है रह-रहकर, जाने कहाँ, जाने कहाँ,

 यादों की उस नदी किनारे, खींच रहा बचपन वहाँ।

 अटूट रिश्ता था जो उससे, मत टूटने दो अब यारों,

 मेरे गाँव की प्यारी नदी को, फिर जीवन दो, ऐ यारों…

 फिर जीवन दो, ऐ यारों… फिर जीवन दो, ऐ यारों…॥7

~~~~~~~~~++++++++~~~~~~~~~~~~~~

                            कोरस 

नदियाँ बचेंगी तो बचेंगे, 

अपने गाँव और संसार,

जल से ही जीवन महकेगा, 

जल से ही होगा उद्धार।

बहती रहे ये जीवनधारा, 

रहे सदा इसका श्रृंगार, 

अटूट रहे अपना रिश्ता,

नदी हमारा ही परिवार ॥

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~`~

                         - शिव मिश्रा