Wednesday, August 19, 2026

खुद से एक मुलाकात

 

खुद से एक मुलाकात

 

शिव मिश्रा

बहुत कुछ था कहने को,

मगर किसी को सुनने की फुर्सत कहाँ थी,

सबको अपनी-अपनी चिंता थी,

मेरी फिक्र करने की फुर्सत किसे थी।

मैंने भी मुस्कुराकर कह दिया—

“हाँ, सब ठीक चल रहा है,”

पर मेरे भीतर ही भीतर कुछ,

हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा ढह रहा था।

मैं दूसरों की रातों में,

सुबह का उजाला भरता रहा,

किसी के टूटे हुए सपनों को,

अपने हाथों से जोड़ता रहा।

किसी ने पूछा नहीं,

कि मेरी नींद क्यों कम हो गई,

किसी ने देखा नहीं,

कि आँखों की चमक कहाँ खो गई।

मैं रिश्तों की छत बनकर,

सबको बारिश से बचाता रहा,

और जाने कब मेरे ही भीतर,

एक  घर बिना छत का रह  गया।

कभी किसी के रूठने पर,

मैंने खुद को मना लिया,

कभी किसी की गलती पर,

मैंने अपना मन समझा लिया।

हर बार यही सोचकर चुप रहा—

“रिश्ता है, जाने दो...”

और धीरे-धीरे मेरी आवाज़ ने,

मुझसे ही कुछ कहना छोड़ दिया।

अब किसी से कोई शिकायत नहीं,

न किसी से कोई सवाल है,

बस इतना-सा अफ़सोस है—

मैं सबके लिए मौजूद रहा,

पर अपने ही लिए बहुत देर से आया हूँ।

अब जो बचा है मेरे भीतर,

उसे भी सँभालना सीख रहा हूँ,

दूसरों के हिस्से की खुशियाँ बाँटते-बाँटते,

अब अपनी खुशी भी पहचान रहा हूँ।

हर किसी का अपना बनने की,

अब कोई ज़िद नहीं रही,

जिसे रहना है, रहे मेरे साथ—

हर दरवाज़े पर खड़े रहने की,

अब आदत नहीं रही।

क्योंकि मैंने जाना है—

अपने आपको खोकर,

कोई रिश्ता बचाया नहीं जाता,

और जो इंसान खुद के भीतर ही नहीं बचा,

वह किसी का अपना कब तक बना रहता?

                        ~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~

                       हैदराबाद 16 अगस्त 2026 

ठहरे हुए एहसास

 ठहरे हुए एहसास

                          -शिव मिश्रा 


कुछ दर्द थे ऐसे, 
जिन्हें शब्दों का सहारा न मिला,
होंठों तक आए कई किस्से,
पर कोई सुनने वाला न मिला।
हर रिश्ते को थामे रखा,
हर चेहरे की हँसी बचाते रहे,
अपनी आँखों की नमी छुपाकर,
दूसरों के आँसू पोंछते रहे।
सबकी राह आसान करते-करते,
अपनी राह कहीं खो गई,
जिनके लिए खुद को बाँट दिया,
उन्हीं के बीच अपनी कमी हो गई।
कभी कोई पूछ ही लेता अगर—
“तुम्हारे दिल में क्या है?”
तो शायद सब कह देते हम,
मगर ऐसा कोई मिला ही कहाँ।
अब शिकायत भी किससे करें,
और किस बात का गिला करें,
हमने ही तो सीखा था उम्र भर—
चुप रहकर भी रिश्ते निभा लिया करें।
कुछ लोग बहुत अपने होकर भी,
दिल तक पहुँच नहीं पाते,
और कुछ अनकहे दर्द,
उम्र भर हमारे साथ रह जाते।
पर अब इन अनकहे दर्दों से,
एक अजीब सी दोस्ती हो गई है,
जैसे शोर भरी इस दुनिया में,
एक अपनी सी खामोशी हो गई है।
अब न कोई शिकवा है, न कोई तलाश,
बस अपने ही भीतर, एक पूरी दुनिया हो गई है।

 

~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~

        हैदराबाद , 16 अगस्त 2026