Sunday, August 23, 2026

भविष्य ......

       

भविष्य ......


— शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति : १० सितम्बर १९८०)

 

कैसे मुस्कान हो?

निरुद्वेग अधरों पर,

बादलों-सा मिलना,

निकलना भी छूट गया।

जीवन के कतिपय अंश,

स्वस्ति के लिए हव्य,

आशातीत बेड़ा एक,

सपने-सा टूट गया।

कच्ची पगडंडी-सी,

किस्मत की रेखाएँ,

धूमिल आशाओं में,

वर्तमान भटक गया।

अतीत के दलदल में

डूबती रहीं तस्वीरें,

कल्पना का यान,

जीर्ण दूब में अटक गया।

शक्ति के समन्वय में,

शांति के प्रणेता से,

वर्षों का खोटा सिक्का,

गाँठ से निकल गया।

(२)

किन्तु समय का रथ

रुकता नहीं पलों में,

अंधकार का पहरा

प्राची से हट गया।

टूटी हुई शिलाओं में

अंकुर की आकांक्षा,

पत्थर का मौन भी

जलधि-सा पिघल गया।

राख की परतों में

दबी हुई चिंगारी,

वेदना का दीप

स्वयं ही जल गया।

थके हुए चरणों को

पथ ने पुकारा तो ,

संघर्ष का संगीत

मन में ढल गया।

भाग्य की लकीरों से

कर्म बड़ा प्रतीत हुआ,

पुरुषार्थ का सूरज

क्षितिज पर निकल गया।

            (३)

विपदाओं के वन में

संकल्प का वटवृक्ष,

आँधियों से जूझकर

और भी मचल गया।

स्वार्थ के बाजारों में

सत्य अकेला सही,

काल के तराजू पर

वही स्वर्ण तौल गया।

पीड़ा के प्रसूनों से

सुगंध जब निकलती,

तब जीवन का अर्थ

मौन में बदल गया।

कल की परिधि पर

उषा का प्रथम स्पर्श,

तम का घना साम्राज्य

क्षण भर में ढल गया।

भविष्य, कोई दान

भाग्य का नहीं होता,

कर्म का प्रत्येक बीज

कल्प वृक्ष बन गया।

             (४)

अब मुस्कान फिर

निरुद्वेग अधरों पर,

जीवन का विश्वास

स्वयं से ही मिल गया।

समय की चौखटों पर,

धूल जमी सदियों की,

आईनों का सच भी,

चेहरों से डर गया।

 मन की मिट्टी दुर्लभ,

बीजों को सँभाले है,

सूखे हुए वन में भी ,

विश्वास पल गया।

कल की धूप शायद,

इन धुँधलों को चीर दे,

पत्थरों की देहरी पर,

 अंकुर निकल गया।

 राख के ढेरों में,

 चिंगारियाँ अभी हैं

 कल का स्वर्णिम सूरज,

 तम से निकल गया।

             (५) 

 टूटे हुए क्षितिज पर,

 फिर रंग बिखरेंगे,

 पथरीली राहों में,

 निर्झर मचल गया।

 कर्म की मशालों से,

 रात पिघल सकेगी,

 भविष्य का दीपक,

 मन में ही जल गया।

 कठिन परीक्षाओं में,

 आस्था अटल रही तो,

 भ्रम का सघन कुहासा,

 छलना-सा टल गया।

 समय स्वयं निष्पक्ष,

 देता नहीं दिशाएँ;

 पगचिह्न ही पथों का

 इतिहास गढ़ गए।

 जो अश्रु बन गिरे थे,

 वे ही बने सरोवर;

 जीवन के ताप

 सारे अमृत में ढल गए।

         (६)

 भविष्य आकाश से 

उतरता नहीं कभी;

 वह तो पुरुषार्थों के

 रक्तिम प्रभात में 

प्रत्येक श्वास लेकर

 प्रतिदिन स्वयं पला

प्रत्येक त्याग से ही 

स्वर्णिम सफल हुआ। 

कर्मठ हथेलियों ने

रेखाएँ नई खींचीं

सोया हुआ प्रारब्ध

पथ पर ही जाग उठा। 

तब मुस्कान खिली— 

निरुद्वेग अधरों पर;

 मन ने स्वयं समय से

 यह मंत्र कह दिया— 

"भाग्य नहीं भविष्य

संकल्प का प्रसून है

जो आज जल सकेगा

वही कल सूर्य होगा।"

       ~~~~~

 शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति : १० सितम्बर १९८०)

 


 





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