Sunday, August 23, 2026

पितृसत्ता

 

      पितृसत्ता

         — शिव प्रकाश मिश्रा 

(१)

पितृसत्ताक्या केवल पुरुष-प्रधान समाज है?
या वह व्यवस्था भी, जो परिवार को सँभालती है?

यह एक ऐसी सत्ता है,
जो पुरुष को रोने भी नहीं देती।
भूले-भटके आँसू आ भी जाएँ,
तो वह उन्हें इस तरह छिपाता है कि कोई देख न पाए।

पुरुष भी इस पितृसत्ता का एक वाहक है
कई बार उसका लाभार्थी,
और कई बार उसका पीड़ित भी।

वह चाहे पुत्र हो, पति हो या पिता,
उसे बचपन से ही मजबूत बने रहने का पाठ पढ़ाया जाता है,
और अनजाने ही उसी कठोरता में ढलना सिखाया जाता है।

जैसे-जैसे वह पुत्र से पति
और फिर पिता बनने की यात्रा करता है,
उसके भीतर भी पितृसत्ता का आकार 
धीरे-धीरे बड़ा होने  लगता  है।

दुखद से दुखद और विषम परिस्थितियों में भी
न रोना, न आँसू बहाना
उसके मजबूत दिखने का आधार बन जाता है।

(२)

वह भीतर से मजबूत भले ही न हो,
लेकिन मजबूत दिखाई देना उसकी मजबूरी है,
और शायद जिम्मेदारी भी;

क्योंकि अगर पिता ही रोएगा,
तो औरों को ढाँढस कौन बँधाएगा?

शायद यही कारण है
कि कोई पुरुष खुलकर रोता-बिलखता दिखाई नहीं पड़ता।

पितृसत्ता की यही मजबूती
और स्वभाव की यह दृढ़ता,
भले ही दिखावटी हो,
फिर भी माँ को भरपूर संबल देती है।

इसीलिए माँ
अपनी करुणा में निर्बाध बह सकती है,
ममता के सागर में
स्वच्छंद हिलोरें ले सकती है।

जब कभी उसकी करुणा के तार
असहनीय पीड़ा से झंकृत होते हैं,
तो वह रोती है, बिलखती है,
फिर अपने ही आँचल से आँसू पोंछकर
स्वयं को सामान्य कर लेती है।

(३)

लेकिन पिता?
वह तो रो नहीं सकता।

कभी-कभी, जब दुःख का जलस्तर
अनायास बढ़ जाता है
और धैर्य के बाँध को लाँघकर बहने लगता है,
तो वह दृश्य बहुत ही असामान्य होता है।

तब भी बाँध की ऊँचाई बढ़ाना ही
एकमात्र विकल्प माना जाता है

जो न उचित और न जरूरी है,
लेकिन शायद यही पितृसत्ता की सबसे बड़ी मजबूरी है।

(४)

परंतु आज,
जब सब कुछ इतना बदल जाए
कि कुछ समझ ही न आए,
तो इसे क्या कहा जाए?

बदलते युग में परिवार बदल रहे हैं,
माँ, बाप और बच्चों के बीच के रिश्ते बदल रहे हैं।

घट रही है अपनेपन की गर्माहट,
संवेदनाओं की आहट,
और पारिवारिक संस्था के संस्कारों की समझ।

धीरे-धीरे यह परिवार
कॉरपोरेट जगत जैसी एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था बन रहा है;

जिसमें रिश्ते नहीं,
केवल वरिष्ठता और कनिष्ठता शेष है।

यहाँ कोई सिर्फ इसलिए वरिष्ठ है
क्योंकि उसने इस संस्था में पहले प्रवेश किया है,
और उसका सेवा-काललंबा है।

(५)

इसके अतिरिक्त कोई विशेष अंतर नहीं रह गया है
सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं में
केवल कर्मचारी-से रह गए हैं।

आज का कनिष्ठ कल वरिष्ठ हो जाएगा,
और वरिष्ठ एक दिन
इस दुनिया से रिटायरहो जाएगा।

समय का चक्र है,
ऐसे ही चलता रहेगा।

लेकिन यह यक्ष-प्रश्न
आज भी अनुत्तरित है

क्या परिवार में जब साधन कम होते हैं,
तब प्यार और ममता ज्यादा होती है?

साधन और संसाधन बढ़ते ही
ममता के बंधन ढीले क्यों हो जाते हैं?

अपनापन अपने आप ही
क्यों सूखने लगता है?

और अपनों के लिए किया गया
वह आजीवन संघर्ष...
अंततः कहाँ खो जाता है?

(६)

शायद इन प्रश्नों का उत्तर
हमारी इसी भूल में छिपा है

कि हमने सुविधाओंको ही
संवेदनामान लिया है।

हम भूल गए हैं कि
परिवार रूपी वृक्ष भौतिक संसाधनों की चमक से नहीं,
बल्कि उसी मौन पसीने
और अनबहे आँसुओं की नमी से सींचा जाता है।

जिस दिन यह नव-निर्मित
कॉरपोरेट व्यवस्था
पिता की उस थोपी गई कठोरता के पीछे का रुदन
और माँ की करुणा का वास्तविक मोल समझ लेगी,

उस दिन साधन भले ही कम हों,
अपनापन फिर से लहलहा उठेगा।

क्योंकि अंततः
घर ईंट-गारे और वरिष्ठता से नहीं,
बल्कि बिसरा दिए गए
समर्पणऔर प्रेमसे आकार लेता है।


   - शिव मिश्रा 

   मूल कृति: दिसम्बर २०१८

 


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