Friday, July 31, 2026

"वक़्त की रेत"



"वक़्त की रेत"


खिड़की से झाँकता हूँ तो यादें सताती हैं, 

चिड़ियों की चहचहाहटें दिल को रुलाती हैं।

मौसम का डर न कोई, न अनहोनी का था ख़ौफ़, 

वो मस्तियाँ तरंगें बनकर उमड़ आती हैं।

बच्चों के बचपन में ही खोकर वो अपना-आप, 

ख़ुद के ही बचपन को फिर से जी जाती हैं।

हिस्सा था मैं भी जैसे उनके ही वजूद का, 

मेरी ही ज़िंदगी का आईना दिखाती हैं।

मुट्ठी से रेत की तरह फिसला है ऐसा वक़्त,

 सूने से घोंसले में उदासी जगाती हैं।

बैठा है प्रौढ़ जोड़ा वहाँ अब तो गुमसुम सा, 

उनकी ख़ामोश आँखें पलकें भिगाती हैं।

पूछा जो मूक जोड़े से क्यों इतने शांत हो?

 बोले कि दूर बच्चों की यादें तड़पाती हैं।

"बच्चे बड़े हुए तो बहुत दूर हो गए", 

सच्चाइयाँ ये दिल को भारी कर जाती हैं।

संभाल पाए 'शिव' न कभी वक़्त की ये रेत, 

तन्हाइयाँ ही अब तो बस घर में आती हैं।

******शिव प्रकाश मिश्रा ********


Sunday, July 19, 2026

पता ही नहीं चला..... कब .....? बच्चे बड़े हो गए


सुबह उगती है, 

और शुरू हो जाती है, 

चहचहाहट घोंसले में, 

जो मेरे बगीचे में बना है, 

और जिसे मैं देखता हूँ, 

खिड़की से झांक कर हर रोज.

शाम को फिर बढ़ जाती है हलचल चहचहाने की, 

आहट भी नहीं होती है, 

रात गहराने की.

हर दिन ऐसे ही शुरू होता है,

और हर रात भी, 

कुछ इसी तरह.

पता नहीं, 

इनके पास हैं 

कितनी खुशियाँ? 

अनमोल पल? 

कितनी तरंगें?

 कितनी उमंगें?

इनके ऊर्जा पात्र 

जैसे अक्षय हो गए हैं, 

हर चीज को मानो पंख लग गए हैं.

एक जोड़ा चिड़ियों का और उनके दो छोटे बच्चे, 

यही सब उनका पूरा संसार बन गए हैं. 

जो देते हैं अविरल, 

अतुल अहसास, 

जैसे सृष्टि का सृजन और क्रमिक विकास.

हर तरफ हरियाली, 

मनमोहक हवाएं 

स्वच्छ खुला नीला आकाश, 

अबोध-विस्मय, 

तार्किक-तन्मय, 

संयुक्त आल्हाद और अति विश्वास.

स्वयं का, 

प्रकृति का, 

या परमात्मा का, 

पता नहीं, 

पर न गर्मी का गम, 

न चिंता सर्दी की,

 न वर्षा का भय, 

न आशंका अनहोनी की,

 व्यस्त और मस्त हरदम,

 बच्चों के साथ,

जैसे बच्चे ही जीवन हैं, 

उनका, 

बच्चों का पालन-पोषण, 

हर पल ध्यान रखना, 

बड़े से बड़ा करना,

 लक्ष्य है उनके जीवन का.

सोना, 

जागना, 

खेलना,

 कूदना, 

उनके साथ,

 खुश रखना, 

खुश रहना साथ-साथ, 

उनके बचपन में समाहित करना, 

अपना जीवन, 

पुनर्परिभाषित और पुनर्निर्धारित करना, 

खुद का बचपन.

कितने ही मौसम आए, 

गए, 

समय के बादल भी उमड़े-घुमड़े और बरस कर चले गए.

खिड़की से बाहर बगीचे में,

 अब, 

जब मैं झांकता हूँ,

 तो पाता हूँ, 

घोंसले हैं,

 कई हैं, 

आज भी, 

और चहचहाहट भी, 

उसी तरह कुछ-कुछ,

पर सामान्य नहीं है, 

सब कुछ, 

उस घोंसले में, 

जिसे मैं लंबे समय से देखता आया हूँ,

 जिसकी चहचहाहट शामिल थी,

 मेरी दिनचर्या में, 

जिसकी यादें आज भी रची-बसी हैं, 

मेरे अंतर्मन में.

ऐसा लगता है, 

जैसे मैं स्वयं अभिन्न हिस्सा हूँ, 

उनके जीवन का, 

और उस घोंसले का, 

या वे सब और वह घोंसला, 

यथार्थ है, 

मेरे जीवन का.

आज भी जीवित है, 

चिड़ियों का वह प्रौढ़ जोड़ा, 

और रहता भी है, 

उसी घोंसले में, जहाँ अब चहचहाहट नहीं है,

 कोई हलचल भी नहीं है.

चलते, 

फिरते, 

उठते-बैठते,

 झांकता हूँ मैं,

 बार-बार उसी घोंसले में, 

जहाँ अब बच्चे नहीं हैं.

मूक दृष्टि से पूछता हूँ मैं, 

जब इस जोड़े से, 

जो मिलते हैं यहाँ-वहाँ बैठे हुए, 

गुमसुम, 

बहुत शांत और उदास से,

उनकी खामोश निगाहें,

कहती हैं बड़ी बेचैनी से, 

“बच्चे बड़े हो गए", 

"... बहुत दूर हो गए",

"अब तो उनकी चहचहाहट भी यहाँ नहीं आती है”

 "आती है तो सिर्फ उनकी याद आती है"

बहुत व्यथित हूँ, 

विचलित हूँ, 

और सोचता हूँ, 

जैसे कल की ही बात है, 

सारा घटनाक्रम आत्मसात है,

पर मुट्ठी में बालू की तरह,

 समय को भी कोई संभाल सका है भला?

पता ही नहीं चला..... 

कब .....? 

बच्चे बड़े हो गए.

**************************


-    - शिव प्रकाश मिश्रा 

  मूल कृति - सितम्बर २०१३ 

वर्षा

भीग जाना चाहिए...

कड़कती सर्दी में, धधकती गर्मी में,
आँधी और तूफ़ानों की बेरहम लहरों में,
अपने घर की चौखट पर ठहर जाना अच्छी बात है,
मगर जब—

सावन की बहार हो,
रिमझिम की फुहार हो,
तो फिर भीग जाना चाहिए। ॥1॥


हर पल सहमे-सहमे जीना
जीवन की पहचान नहीं,
सिर्फ़ साँसों का बोझ उठाना
जीने का सम्मान नहीं।

अनजानी राहों में,
संघर्ष की बाँहों में,
संभलकर चलना अच्छी बात है,
मगर जब—

दिल ही आवाज़ लगाए,
सपना सामने मुस्काए,
तो फिर दौड़ जाना चाहिए। ॥2॥


हर लम्हे का कोई तर्क नहीं होता,
हर सपने का कोई मोल नहीं होता।
जो अपने ही दिल की धड़कन न सुन पाए,
उससे बड़ा कोई शोर नहीं होता।

वक़्त के थपेड़ों में,
ज़िंदगी के झमेलों में,
ख़ामोशी ओढ़ लेना अच्छी बात है,
मगर जब—

अपनों में तकरार हो,
रिश्तों को मनुहार हो,
तो फिर झुक जाना चाहिए। ॥3॥

दीपक आँधियों से लड़ता है,
नदियाँ पर्वत चीर निकलती हैं।
जो जोखिम से रिश्ता रखते हैं,
मंज़िलें अक्सर उन्हीं को मिलती हैं।

जंगली रातों में,
पथरीली राहों में,
सतर्क रहना अच्छी बात है,
मगर जब—

मायूसी की रात ढल जाए,
उम्मीदों का सूरज निकल आए,
तो फिर मुस्कुराना चाहिए। ॥4॥

हर मौसम सुहाना नहीं होता,
हर चेहरा बेगाना नहीं होता।
हर ठोकर मंज़िल छीन नहीं लेती,
हर अँधेरा हमेशा का ठिकाना नहीं होता।

अनजाने मोड़ों पर,
लक्ष्य के छोर पर,
संघर्ष करना अच्छी बात है,
मगर जब—

लहज़ों में तल्ख़ी हो,
बातों में कड़वाहट हो,
तो फिर मुस्कुराकर आगे बढ़ जाना चाहिए। ॥5॥

सर्द हवाओं से लड़कर
पेड़ अपनी जड़ें नहीं छोड़ते।
बादल चाहे जितना भटक लें,
आख़िर धरती पर ही बरसते।

फूलों का धर्म है महकना,
दीपों का धर्म है जलना।
अपने सुरक्षित दायरों में रहना अच्छी बात है,
मगर जब—

ख़ुशियों का मौसम हो,
चाहत का आलम हो,
तो फिर बाँहें फैलाकर झूम जाना चाहिए। ॥6॥

हर ख़्वाब मुकम्मल नहीं होता,
हर इंतज़ार सफल नहीं होता।
जो किस्मत में लिखा है,
उससे पहले कुछ हासिल नहीं होता।

इन सच्चाइयों के साथ
जीना अच्छी बात है,
मगर जब—

कोई दिल में उतर जाए,
प्यार आँखों से छलक जाए,
तो फिर तैर जाना चाहिए। ॥7॥

ज़िंदगी हर वक़्त एहतियात का नाम नहीं,
हर मोड़ पर हिसाब-किताब का काम नहीं।
कुछ पल ऐसे भी आते हैं,
जब तर्क से अधिक विश्वास ज़रूरी होता है।

जब हँसी बेवजह आ जाए,
जब आँखें यूँ ही भर आएँ,
जब मन कहे—"यही क्षण है",
तो फिर...

भीग जाना चाहिए,
दौड़ जाना चाहिए,
झुक जाना चाहिए,
मुस्कुराना चाहिए,
आगे बढ़ जाना चाहिए,
झूम जाना चाहिए,
और...

पूरी शिद्दत से जी जाना चाहिए।

  ~~~~~~~~~~~~~~~

~ शिव मिश्रा 

भीग जाना चाहिए... (गीत)

🎵 भीग जाना चाहिए... (गीत)

— शिव मिश्रा


कड़कती सर्दी में, धधकती गर्मी में,

आँधी में, तूफ़ान में, घर में रहना अच्छी बात है...

मगर जब सावन की बहार हो,

रिमझिम-सी फुहार हो,

सूना मन फिर से गुलज़ार हो...

तो फिर बाहर निकलना चाहिए,

भीग जाना चाहिए,

जी भर कर जी लेना चाहिए!


हर पल सहमे-सहमे जीना, जीवन की पहचान नहीं,

सिर्फ़ साँसों का बोझ उठाना, जीने का सम्मान नहीं।

अनजानी राहों में, संघर्ष की बाँहों में, संभलकर चलना अच्छी बात है...

मगर जब दिल आवाज़ लगाए,

सपना सच होने को आए...

तो फिर दौड़ जाना चाहिए,

और मुस्कुराना चाहिए,

जी भर कर जी लेना चाहिए! (1)

 


हर लम्हे का कोई तर्क नहीं, सपनों का कोई मोल नहीं,

जो अपने दिल की सुन न सके, उससे बड़ा कोई शोर नहीं।

वक़्त के थपेड़ों में, जीवन के झमेलों में, चुप रह जाना अच्छी बात है...

मगर जब अपनों की दरकार हो,

रिश्तों में बहता प्यार हो...

तो फिर झुक जाना चाहिए,

गले मिलना चाहिए,

जी भर कर जी लेना चाहिए! (2)

 


दीपक आँधी से लड़ता है, नदियाँ चट्टानों से भिड़ती हैं,

जो ख़तरों से खेलते हैं, मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं।

पथरीली राहों में, अँधेरी रातों में, सतर्क रहना अच्छी बात है...

मगर जब उम्मीद का सूरज हो,

जीवन का एक नया सवेरा हो...

तो फिर मुस्कुराना चाहिए,

खुश होना चाहिए,

जी भर कर जी लेना चाहिए! (3)

 


सर्द हवाएँ थम जाती हैं, पतझड़ भी बीत ही जाता है,

जो जड़ों से जुड़े रहते हैं, उनका जीवन खिल जाता है।

अपने दायरों में, अपने फैसलों में, संतुलित रहना अच्छी बात है...

मगर जब ख़ुशियों का मिज़ाज हो,

प्यार का पहला आगाज़ हो...

तो फिर बाँहें फैलाना चाहिए,

झूम जाना चाहिए,

भीग जाना चाहिए,

जी भर कर जी लेना चाहिए...

           दिल से जी लेना चाहिए! (4)


          ~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~