क्या तुमने कुछ सुना?
- शिव प्रकाश मिश्रा
क्या तुमने भी सुना कभी, जो कोयल ने था गाया?
कली-कली थी मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।
मौन पड़ा उपवन था लेकिन, बुलबुल गीत सुनाती,
घुमड़ रहे थे सघन बादला, नदियाँ शोर मचातीं।
ऊपर से सागर था शांत, पर भीतर ज्वार उठा था,
जैसे उसके अंतर्मन में, कोई गीत छुपा था।
प्रकृति के इस आयोजन में, सब कुछ बोल रहा था,
बिन शब्दों के मौन गगन भी, जैसे डोल रहा था।
क्या तुमने भी देखा उषा ने, कैसा जादू था दिखलाया?
सूरज उगने से पहले ही, अँधियारे को था लौटाया।
क्षितिज भाल पर सजने लगी थी, धरती की प्यारी-सी लाली,
चहक उठी थीं चिड़ियाँ सारी, खुश था पत्ता-पत्ता, डाली।
क्या तुमने देखा है मौन भी, अपनी कथा सुनाता?
शांत क्षितिज के पीछे छिपकर, सूरज है मुस्काता।
ज्वार उठने से पहले सागर, बिल्कुल शांत ठहरता,
मन के भीतर का तूफ़ान भी, बाहर कहाँ उभरता।
उषा आने से पहले ही, अँधियारा ढल जाता है,
जीवन में भी परिवर्तन तो, पहले भीतर आता है।
जो सुन लेता उस अनहद को, जो शब्दों में ना ढलता,
वही प्रकृति की भाषा को, अपने भीतर है पढ़ता।
क्या तुमने वह सुना कभी, जो कहता कोई नहीं है?
क्या तुमने वह देखा है, जो दिखता कहीं नहीं है?
शायद जीवन का संगीत, इन शब्दों से परे कहीं है,
जो मन से सुनना चाहे तो, सब कुछ मिलता यहीं है।
बस आँखों को देखना होगा, कानों को सुनना होगा,
प्रकृति के मौन संवादों में, स्वयं को चुनना होगा।
कोयल केवल गाती नहीं, कुछ भाव सुनाती रहती है,
सूरज से पहले आती उषा, पथ उज्ज्वल करती चलती है।
जो सुन लेता मौन प्रकृति का, वह खुद को सुन लेता है,
समझ प्रकृति के संकेतों को, वो जीवन चुन लेता है।
~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~
( मूल रचना - शिक्षक दिवस २०२६ )