क्या तुमने कुछ सुना?
- शिव प्रकाश मिश्रा
क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?
कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।
प्रकृति के इस आयोजन में, कण-कण बोल रहा था,
बिन शब्दों के मौन गगन भी, रस में डोल रहा था।
क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?
कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।
(१)
ऊपर से था शांत समंदर, भीतर ज्वार उठा था,
जैसे उसकी नीरवता में, कोई राग छुपा था।
महा-ज्वार से पहले सागर, जैसे मौन ठहरता,
मन के अंतर का तूफ़ान भी, बाहर कहां उभरता!
क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?
कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।
(२)
सूरज के आने से पहले, उषा सिंदूर सजाती,
अँधियारे को दूर भगाकर, पथ उज्ज्वल कर जाती।
चहक उठी थीं चिड़ियाँ सारी, हँसती डाली-डाली,
धरती के आंचल में भर दी, भोर ने नूतन लाली।
क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?
कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।
(३)
जो शब्दों में ढल न सका, वह अनहद नाद जगाता,
शांत क्षितिज के पीछे छिपकर, जीवन भी मुस्काता।
जो सुन लेता मौन प्रकृति का, वह खुद को सुनता है,
इन पावन संकेतों में वह, अपना जीवन चुनता है।
क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?
कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।
~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~
( मूल रचना - शिक्षक दिवस २०२६ )
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