Wednesday, August 31, 2022

आतंकी प्यास

 

आतंकी प्यास

प्यास से व्याकुल एक व्यक्ति ने

एक घर का दरवाज़ा खटखटाया।

 एक कवि-नुमा चेहरा बाहर आया,

 जिसे देखकर वह व्यक्ति बोला— 

‘प्यासा हूँ, अगर... पानी...!’

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं!” कहकर कवि ने,

 उसे ड्राइंग रूम में बैठाया,

 ख़ुद बैठकर बोला—

 कल भी मैं प्यासा था,

 आज भी मैं प्यासा हूँ,

 सब कुछ आस-पास है,

 फिर भी दिल उदास है,

 न जाने कैसी प्यास है?

प्यासे व्यक्ति को बात समझ नहीं आई,

 कवि ने बात थोड़ी आगे बढ़ाई—

 "वह था ग्यारह सितंबर,

 अमेरिका पर आतंकी क़हर!

 उसी के अपहृत विमानों को

 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकरा दिया,

 एक सौ दस मंज़िली बिल्डिंग को धूल में मिला दिया।

 हज़ारों सिसकियाँ मलबे में दफ़्न हो गईं,

 समूचे विश्व की आत्मा दहल गई।

 कौन थे हमलावर?

 क्या उद्देश्य था?

 इसका आभास है,

 न जाने कैसी प्यास है?"

प्यासा व्यक्ति घबड़ाया,

 उसे लगा कि कवि उसकी बात समझ नहीं पाया।

 उसने सोचा विज्ञापन की भाषा में समझाए,

 शायद कवि समझ जाए!

 यह सोचकर बोला—

“ये दिल माँगे मोर!”

 कवि ने कहा—“श्योर!”

और बोला—

 वे पूरी दुनिया की करते थे निगरानी,

 पर अपने घर की बात न जानी।

 चार-चार विमान एक साथ अपहृत हो गए,

 दुनिया के सुरक्षिततम पेंटागन पर हमले हो गए!

 अब आतंकी साए में आतंकियों की तलाश है,

 न जाने कैसी प्यास है?

प्यासा व्यक्ति चिल्लाया— “ओह नो!”

 कवि बोला—“यस

 इतिहास गवाह है,

 जो भस्मासुर बनाता है,

 वह उसी के पीछे पड़ जाता है।

 आतंकवाद का दर्द भी तभी समझ में आता है,

 जब कोई स्वयं इसकी चपेट में आता है।

 आतंकवाद से लड़ने के लिए वे उसी के साथ खड़े हैं,

 जिसके तार आतंकवादियों से जुड़े हैं!

 आतंकवाद से लड़ने का यह अधूरा प्रयास है,

 न जाने कैसी प्यास है?"

प्यासा व्यक्ति निढाल हो सोफ़े पर लुढ़क गया,

 यह देख कवि-पत्नी का हृदय पिघल गया।

 बोली—

 "न आप अमेरिका हैं,

 न पाकिस्तान,

 न रूस हैं,

 न अफ़ग़ानिस्तान!

 आप भारत हैं,

 और भारत को दूसरों की आस छोड़नी होगी,

 और आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी होगी।

 इस बेचारे को नाहक सता रहे हो,

 पानी की जगह कविता पिला रहे हो!

 यह मूर्छित व्यक्ति कोई और नहीं,

 स्वयं ओसामा बिन लादेन है...

 क्या इसका तुम्हें एहसास है?

 न जाने कैसी प्यास है?

 न जाने कैसी प्यास है?"

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- शिव मिश्रा 

( मूल कृति २ अक्टूबर 2001)

हम दोस्त पत्रिका में प्रकाशित  

Friday, February 18, 2022

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे ?

"कैसे हम सबके दीपक जलेंगे"


कब जले दीपक हम  देख ही न पाये ,

कैसी थी रोशनी? अँधेरा  मिटा न पाये ,


अँधेरे में रहकर स्वविवेक खो  दिया है ,

आस्था को धक्का दे कबका गिरा दिया है

सब कुछ लुटा दिया, कुछ भी समझ न पाये,

चेहरे पे किसके क्या है, ये तक  न जान पाये ,


इस ओर अँधेरे के हम कैदी बने हुये  हैं ,

उस ओर उजाले  के  प्रहरी  खड़े  हुये हैं ,

जब तक रहेगी ऐसी दीवाल विभाजन  की,

हो चाहे दिवाली ही, होली जलेगी सपनो की, 


उस पर सिकेगी रोटी स्वार्थ व अधिकारों की,

तब तक सजा मिलेगी, दर्द सह चुप रहने की,

आंखे भी है और अंधे भी, समझेगा कोई कैसे

बिन रोशनी के दीपक, कोई  जला  हो जैसे,


इन आँखों से जब तक आंसू गिरेंगे,

कैसे  हम सबके  दीपक जलेंगे  ?

कब जल उठे दीपक, हम देख ही न पाए, 

कैसी थी वह रोशनी, जो अंधेरा मिटा न पाए?

अंधेरे में रहकर मानो स्वविवेक खो दिया है, 

आस्था को धक्का दे, कबका गिरा दिया है।

 सब कुछ लुटा चुके, पर कुछ समझ न पाए, 

 चेहरे पर किसके क्या है, यह भी न जान पाए।

इस ओर अंधेरे के हम कैदी बने हुए हैं,

 उस ओर उजाले के प्रहरी खड़े हुए हैं।

 जब तक रहेगी ऐसी दीवार विभाजन की,

हो भले दिवाली ही, होली जलेगी सपनों की!

जिस पर सिकेगी रोटी स्वार्थ-अधिकारों की,

तब तक सज़ा मिलेगी, दर्द सह चुप रहने की।

 आँखें भी हैं और अंधे भी, समझेगा कोई कैसे?

 बिन लौ के ही जैसे, कोई दीप जला हो जैसे!

इन आँखों से जब तक यूँ आँसू गिरेंगे,

 तब तक कैसे भला, हम सबके दीपक जलेंगे?


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       - शिव मिश्रा 

मूलकृति अक्टूबर २०१६ 

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