बाल दिवस : कर्णधार
ऊपर से नीचे तक कोयले से सने हुए,सघन धूम्र-बादलों में पटरियों पर झुके हुए।
मरने-कटने से बेफ़िक्र, गाड़ियों में घुसे हुए,
छानते हैं ख़ाक खाँस कोयला उठाते हुए ।
या फिर बस्ती से दूर, जहाँ होते गंदगी के ढेर,
चीथड़े लपेटे, वही चीथड़े उठाते हैं।
फटे कपड़ों में अपने घाव को मक्खियों से बचाते हुए,
गंदगी कुरेदकर काँच और काग़ज़ उठाते हैं।
कबाड़ के साथ-साथ हैज़ा और तपेदिक भी,
ले आते हैं साथ, अपनी मजबूरियों से घिरे हुए।
चौराहों पर कई बार, होती है जब बत्ती लाल,
दौड़ते हैं एक साथ, साफ़ करने मोटर कार कपड़ा लिए।
या फिर छोटे-बड़े होटलों में करते हैं बर्तन साफ़,
बची हुई जूठन और मालिक की मार खाते हैं।
जोड़ते हैं पंक्चर, या फिर कसते हैं नट-बोल्ट,
पुर्जों के साथ चुपके से आँखें भी पोंछते हैं।
करते हैं घरों का काम, झाड़ू से लेकर बर्तन तक,
मालकिन के पैर दबाते, उनके बच्चे भी खिलाते हैं।
उन बच्चों को छोड़ने-लेने रोज़ स्कूल तक जाते हैं,
पर अफ़सोस! वे ख़ुद हमेशा निरक्षर रह जाते हैं।
बेबस ज़िंदगी के सताए, अपनी ही उमंगों से डरे हुए,
दलित, शोषित, सभ्यता से परे, कौन बच्चे हैं ये, आप सोचेंगे?
तो सुनो! ये हैं कर्णधार स्वाधीन भारत के,
अपने समाज में कहीं भी जाएँ आप, हर जगह मिलेंगे।
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Saturday, November 14, 2020
बाल दिवस : कर्णधार
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- शिव मिश्रा
मूलकृति १४ नवम्बर १९७६
अमर उजाला आगरा में प्रकाशित
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