Friday, July 31, 2026

"वक़्त की रेत"



"वक़्त की रेत"


खिड़की से झाँकता हूँ तो यादें सताती हैं, 

चिड़ियों की चहचहाहटें दिल को रुलाती हैं।

मौसम का डर न कोई, न अनहोनी का था ख़ौफ़, 

वो मस्तियाँ तरंगें बनकर उमड़ आती हैं।

बच्चों के बचपन में ही खोकर वो अपना-आप, 

ख़ुद के ही बचपन को फिर से जी जाती हैं।

हिस्सा था मैं भी जैसे उनके ही वजूद का, 

मेरी ही ज़िंदगी का आईना दिखाती हैं।

मुट्ठी से रेत की तरह फिसला है ऐसा वक़्त,

 सूने से घोंसले में उदासी जगाती हैं।

बैठा है प्रौढ़ जोड़ा वहाँ अब तो गुमसुम सा, 

उनकी ख़ामोश आँखें पलकें भिगाती हैं।

पूछा जो मूक जोड़े से क्यों इतने शांत हो?

 बोले कि दूर बच्चों की यादें तड़पाती हैं।

"बच्चे बड़े हुए तो बहुत दूर हो गए", 

सच्चाइयाँ ये दिल को भारी कर जाती हैं।

संभाल पाए 'शिव' न कभी वक़्त की ये रेत, 

तन्हाइयाँ ही अब तो बस घर में आती हैं।

******शिव प्रकाश मिश्रा ********


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