तपन
— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: अप्रैल १९७८)
"तपन सब मुझ में समाई है,"
भयंकर शीत-लहर भी करे क्या,
तपन सब मुझमें समाई है!
सूर्य की आँच में रखा है क्या,
आग अब दिल में जलाई है!
चित्रकारों से बनेगा क्या,
जो राशि अंतर में बसाई है!
बेला, चमेली में अब बचा क्या,
सुगंध सब मन में समाई है !
ग़मों का ज्वालामुखी फूटे तो क्या,
ख़ुशी जब रग-रग में छाई है!