Tuesday, February 23, 2016

तपन सब मुझ में समाई है,

तपन

— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: अप्रैल १९७८)

"तपन सब मुझ में समाई है,"


भयंकर शीत-लहर भी करे क्या, 

                                तपन सब मुझमें समाई है!

सूर्य की आँच में रखा है क्या, 

                                आग अब दिल में जलाई है!

चित्रकारों से बनेगा क्या,

                                 जो राशि अंतर में बसाई है!

बेला, चमेली में अब बचा क्या,

                               सुगंध सब मन में  समाई है !

ग़मों का ज्वालामुखी फूटे तो क्या,  

                                    ख़ुशी जब रग-रग में छाई है!


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            शिव प्रकाश मिश्रा

                मूल कृति अप्रैल १९७८ 
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सिर्फ तेरा साथ हो..



सिर्फ तेरा साथ हो..

— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: अगस्त १९८१)


ज़ुल्फ़ों की छाँव में, सपनों के गाँव में,

 अधरों को ढूँढ़ती, नन्ही सौगात हो।

घर में, जमात में, दिल में, दवात में, 

बचपन से खेलता, जवानी का हाथ हो।

आँखों से आँखों में, टूटती साँसों में, 

कस्तूरी-से महकते, अपने जज़बात हों।

सावन के झूलों में, वर्षा की बूँदों में, 

प्रेम से भीगते, हम एक साथ हों।

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शिव प्रकाश मिश्र
  मूल कृति अगस्त १९८१ 
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रोज़ी और रोटी


    रोज़ी और रोटी

— शिव प्रकाश मिश्रा 

(मूल कृति: मई १९८०)


मेरी कहानी बिखर रही है

 एक स्वप्निल प्रासाद में, 

रोशनी ख़ुद भटक रही है, 

काँप रहा है मेरा भविष्य... मेरे ही हाथों में!

जान-बूझकर डालता है कोई गरम रेत, 

मेरे फूटे हुए छालों में। 

विचारों के वातायन से गिर रहा हूँ मैं धरती पर, 

जहाँ पग-पग पर है ठोकर, 

और हर ठोकर पर... वास्तविकता का एक नया अनुभव!

आ पड़ा है मेरे दिल पर 

एक भारी-भरकम बोझ अनायास ही, 

असंतुलित-से कदम पड़ रहे हैं कहीं के कहीं।

मिल रही है कृत्रिमता, क्षुद्रता और समस्याओं की 

यह असहनीय चिकोटी!

 मेरे नेत्रों के धुँधलके में, 

चमक रहे हैं सिर्फ़ दो शब्द— 

रोज़ी और रोटी.........!

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     शिव प्रकाश मिश्र
    मूल कृति मई 1980
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आज का इन्सान


     आज का इंसान

— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: मई १९८३)


सरे-बाज़ार में ईमान-धर्म बेच रहे हैं,

 बोलियाँ बोलकर इंसान का मन बेच रहे हैं! 

रक्त अधरों पे उदित हास क्या करे कोई, 

साज़-ए-ग़म, फ़ख़्र के आने की तपन देख रहे हैं!!

माँगने पर नहीं मिलता था कभी कुछ जिनसे,

 धर्म के नाम पर आकर वे रहम बेच रहे हैं!

 आस भगवान से इंसान क्या करे कोई,

 आज इंसान ही इंसान को ख़ुद बेच रहे हैं!!

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-----  शिव प्रकाश मिश्र -------------
         मूल कृति मई १९८३ 
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बेरोजगार नेता

चुनाव प्रचार में
बोले एक नेता
बेरोजगार मै भी हूँ,
मुशीबतो का मारा हुआ.
काम जब मिला नहीं,
चुनाव में खड़ा हुआ ..
मेरी हालत पर,
सब लोग रहम कीजिये.
वोट न सही चंदा ही दीजिये..
आपकी सब बातें,
अक्सर भूल जाता हूँ.
पर आपका चुनाव चिन्ह,
याद दिलाता हूँ..
कोचिंग दल बदल की अच्छी चलाता हूँ,
कुछ नहीं दे सका विश्वास तो दिलाता हूँ..
नौकरी नहीं तो आरक्षण
जरूर दूंगा,
आप मेरा काम करिए
आपका काम तमाम
कर दूंगा..
`````````````````````````````````````````
 - शिव प्रकाश मिश्र
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मूल कृति मार्च 1980

कोई ख़यालों में क्यों... नहीं... होता...?


कोई ख़यालों में क्यों... नहीं... होता...?

— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: फ़रवरी १९८०)

आसमाँ क्यों नहीं झुकता,

 समंदर क्यों नहीं थमता? 

प्रेम का अंकुर पनप कर, 

हिमालय क्यों नहीं होता?


चाँदनी मन में खटकती,

 हवा तन-मन को झुलसाती,

 कूक कोयल की न भाए, 

मेघ सावन में रुलाएँ, 

कोई भी मौसम यहाँ पर,

 सुहाना क्यों नहीं होता?


पंथ लंबा, भ्रमित राही,

दर्द बनकर घटा छाई, 

उष्ण बालू, फटे छाले, 

कौन पीड़ा को सँभाले? 

कोई भी अपना यहाँ पर, 

अपना क्यों नहीं होता?


नेह के बंधन जटिल हैं, 

नीड़ में पंछी विकल है,

 ज़िंदगी का क्या ठिकाना

, खो गया है आशियाना,

 प्रेम का आँचल यहाँ पर,

 बसेरा क्यों नहीं होता?


नींद पलकों में नहीं है, 

न कोई ख़्वाब, न इंतज़ार, 

मन है व्याकुल, तन सुलगता,

 दिल बहकता बार-बार, 

कोई आकर ख़यालों में, 

हमारा क्यों नहीं होता?



***** शिव प्रकाश मिश्र******
       मूल कृति फरबरी 1980

बदनुमा दाग हूँ मै !

बदनुमा दाग़ हूँ मैं

   - शिव प्रकाश मिश्रा 

छोड़ दो साथ अब मेरा, एक बुझता चिराग़ हूँ मैं, 

नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।

यही दुर्भाग्य है मेरा, न आ सका काम कुछ तेरे, 

दुखों और दर्द के सिवा, क्या था भला पास मेरे।

आज चाहो तो मुझे अंतिम मधुर मुस्कान दे दो, 

या जो किसी को न दिया हो, वह अपमान दे दो।

अंधेरी वादियों में भटकता विरह का राग हूँ मैं, 

नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।

आत्मा पर बोझ बनकर, चाहकर भी न बोल पाया, 

अंतर के घाव रिसते रहे, किसी से भेद न खोल पाया।

आज चाहे इस तपस्या का यहीं अवसान कर दो, 

कहूँगा कुछ नहीं, चाहे मुझे बदनाम कर दो।

जो बुझ न सके कभी, ऐसी सुलगती आग हूँ मैं, 

नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।

ठोकरों ने ही सिखाया, राह पर कैसे चला जाए, 

टूटकर बिखरे बिना भी, दर्द को कैसे जिया जाए।

जिनको दुनिया ने कहा दाग़, वही तो मेरी पहचान हैं,

 वक़्त की इस धूप में तपकर बने जीवन के वरदान हैं।

अब न शिकवा है किसी से, न ख़ुद से अजनबी हूँ मैं, 

उम्र की इस सांझ में, अपना ही सबसे क़रीबी हूँ मैं।

बुझता चिराग़ नहीं अब, अनुभव का प्रकाश हूँ मैं, 

जो समझ सके तो जीवन हूँ, न समझे तो दाग़ हूँ मैं।

— शिव प्रकाश मिश्रा





कैसे.. कैसे.. लोग




अपनी छाया से डरते हैं लोग

— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: जून १९८०)

ख़ुद मरने की मन्नत मनाते हैं लोग, 

हँसते-हँसते भी रोते-से रहते हैं लोग!

सूना घर है कहीं, कोई रहने वाला नहीं,

 एक छत के लिए क्यों तरसते हैं लोग।

कोई अपना नहीं, कोई सपना नहीं,

 कितने अपने भी सपने-से लगते हैं लोग!

फ़ासले हैं बहुत, फिर भी कितने क़रीब, 

कितने अपनों से दूरी बनाते हैं लोग।

क्यों जनाज़ा उठा? जानते हैं सभी,

फिर भी मरने से कितना डरते हैं लोग!

ऐ सितम! अब शिव क्या भरोसा करे, 

अपनी छाया से भी अक्सर डरते हैं लोग... 

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सर्व प्रथम दैनिक वीर हनुमान औरैया में प्रकाशित 



हड़ताल ....... सूखा

हड़ताल ....... सूखा

— शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति: १९७९ — ६ नवम्बर १९७९ को 'दैनिक वीर हनुमान', औरैया में प्रकाशित)

होकर परेशान महँगाई भत्ते से, 

वर्षा विभाग सहित, इंद्र ने कर दी हड़ताल!

 सूखे की आग में जलती फ़सलों को जैसे—

 घर में श्मशान देख, जनता हो गई बेहाल।

आवश्यक सेवाओं में भी, 

अब तो हड़ताल होने लगी है, 

और नज़रबंदी में... 

जमाखोरी की आदत बनी है।

हे इंद्र देव! अब तो दया कर दो, 

कंट्रोल से न सही, 

ब्लैक में ही... वर्षा कर दो!!

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    - शिव प्रकाश मिश्र
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मूल कृत - १९७९, ६ नवम्बर १९७९ को दैनिक वीर हनुमान औरय्या में प्रकाशित 

सूखा और किसान


सूखा और किसान

— शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति: १९७९ — ६ नवम्बर १९७९ को 'दैनिक वीर हनुमान', औरैया में प्रकाशित)

कुछ कह रहे हैं— 

सूखे की आग में जलती फ़सलों को देख, 

वे अपने ही जी को जलाकर जी रहे हैं।

डीज़ल-केरोसिन डीलरों की तरह,

 इंद्र के यहाँ 'स्टॉक में नहीं है' 

की तख्ती देख, 

बेबस किसान रो रहे हैं!

भूख से बिलखते-सिसकते आदिवासी,

इस घोर मजबूरी में अब जड़ें ही खा रहे हैं।

और उधर... करके हड़ताल नज़रबंदी में,

 भंग छान रहे जो नशाबंदी में, 

अपनी मस्ती में लंबी तान... 

इंद्र देव अब भी सो रहे हैं!!

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     - शिव प्रकाश मिश्र
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मूल कृत - १९७९, ६ नवम्बर १९७९ को दैनिक वीर हनुमान औरय्या में प्रकाशित 

कौन हूँ मैं ?



कौन हूँ मैं ?

— शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति: १७ जून १९८१ |)


कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा?

न पूछो अभी तक क्या करता रहा!

एक चाहत लिए दाँव रखता रहा,

शह उनकी पे ही मात खाता रहा।

हारकर मैंने खोया नहीं हौसला,

जीत या हार होना नहीं फ़ैसला।

आज अपना कोई बन गया अजनबी,

रोज़ जिसको हृदय में बिठाता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा!


एक पागल पथिक-सा फिरूँ दर-बदर,

कितनी राहें चलीं, कुछ नहीं है ख़बर।

ताक पर आस-सपन सजाता रहा, 

नीर पलकों में अपनी छुपाता रहा।

आज ऐसी कहानी नहीं कह सका,

शब्द जिसके लिए ढूँढ़ता फिर रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (१)


धूप ने हर कदम पर जलाया मुझे,

छाँव ने भी कहाँ फिर बचाया मुझे।

वक्त की आँधियों में बिखरता रहा,

फिर भी उम्मीद लेकर सँवरता रहा।

जो मिला राह में, साथ चलता रहा,

जो गया छोड़कर, याद बनता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (२)


एक दीपक अँधेरों में जलता रहा,

अपनी लौ से स्वयं को ही छलता रहा।

रात भर ख़्वाब की नाव खेता रहा,

भोर होते ही साहिल बदलता रहा।

दर्द को गीत की शक्ल देता रहा,

मौन में भी किसी से मैं कहता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (३)


ज़िंदगी ने कई रग दिखलाए हैं,

कुछ हँसी के, कई अश्रु बन आए हैं।

जो मिले फूल, काँटों समेत ही मिले,

जो मिले लोग, अक्सर बदलते मिले।

फिर भी रिश्तों की माला पिरोता रहा,

टूटकर भी सदा मुस्कुराता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (4)


आईने से कभी जब नज़र मिल गई,

एक अनजान-सी फिर डगर मिल गई।

खोजता था जिसे मैं ज़माने भर,

वो मेरे ही भीतर आकर मिल गई।

खुद को पाने की कोशिश में उम्र भर,

अपने ही प्रश्न का उत्तर बनता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (५)


कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा,

यह सवाल उम्र भर मुझसे उलझता रहा।

ढूँढ़ता था जिसे मैं जहाँ-तहाँ,

वह मेरे ही भीतर ठहरता रहा।

अब न मंज़िल की चाहत, न रस्तों का ग़म,

एक मुसाफ़िर था, बस यूँ ही चलता रहा।

जो लिखा था मुकद्दर ने, सहता रहा,

जो न लिखा था, उसको भी कहता रहा।

अब न पूछो कि क्या खोया, क्या पा लिया,

ज़हर पीकर भी जीवन को गा लिया।

कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा?

न पूछो अभी तक क्या करता रहा!

न पूछो अभी तक क्या करता रहा...॥ (६)

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        - शिव प्रकाश मिश्र
           १७ जून १९८१ 
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