दो क्षणिकाएँ
— शिव प्रकाश मिश्रा
(१)
प्रेम में तुम्हारे,
है यही तुमसे मेरा अंतर,
तुम देखते हो बाहर,
मैं देखता हूँ अंदर...
(२)
एक बस कंडक्टर ने
टिकट बनाने में किया
नया तरीक़ा अख़्तियार,
फ़र्स्ट-एड बॉक्स पर लिख दिया—
"बिना टिकट यात्री होशियार!"
++++++++++++++++++++
- शिव प्रकाश मिश्र
- S.P.MISHRA
++++++++++++++++++++
No comments:
Post a Comment