ऋतुराज बसंत
— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति: दिसम्बर १९७९ — सर्वप्रथम 'दैनिक वीर हनुमान', औरैय्या में प्रकाशित)
अरे तुम फिर आ गई ऋतुराज!
बहाती सुंदर सुरभि-सुवास।
बिखेरा कैसा यह उन्माद?
लगाती हो मुझसे कुछ आस!
ओट में सुंदरता के हो,
बुना है कैसा दुर्गम जाल?
फँस गए सब ही अपने आप,
टेक तेरे घुटनों पर भाल!
रुचेगी कैसे सुंदरता,
रिस रहे जिसके घाव हरे?
हो रहा हो काँटों से प्यार,
उसे क्या गंध-सुगंध करे?
चाहिए नहीं मुझे सुख चारु,
अगर हो निर्जन कोई ठौर।
रहूँगा भी कैसे मैं वहाँ,
जहाँ हो मानवता ही गौण!
बुझी हो आँसुओं से जो प्यास,
न आएगा उसको मधु-रास।
लगा लो अपना सारा ज़ोर,
न होगा मुझको अब विश्वास...
सुनाओ कोयल का वो गान,
करो मत पीड़ित का अपमान।
जहाँ सिसकी ही सरगम हो,
वहाँ क्या वीणा की तान!
सजा लो कलियों का संसार,
बहा लो मलय-पवन की धार।
मगर जो भूखे सोए हैं,
उन्हें क्या भाए यह श्रृंगार?
उड़ाओ कलियों के ये रंग,
जगाओ मादकता की तरंग।
मगर जो पीड़ा में डूबे,
कहाँ है उनमें वो उमंग?
वनों में दहक रहे जो पलाश,
बिखेरें चाहे स्वर्ण-प्रकाश।
मगर जिस घर में अंधियारा,
उसे क्या भाएगा आकाश?
भले ही गूँजे अलि-गुंजार,
झुके हों तरुवर के ये डार।
मगर जो छाले पैरों में,
उन्हें कब भाए यह बहार?
सुहाने आमों के ये बौर,
मचलती हवाएँ चारों ओर।
मगर जो रोटी को तरसे,
उसे क्या सुध है ओ विभोर!
दिखाओ मत ये झूठे सपन,
न बहकेगा मेरा यह मन।
जहाँ पर जीवन मुरझाया,
व्यर्थ है वहाँ यह नव-जीवन!
करो मत मिथ्या यह प्रयास,
न बदलो तुम मेरा विश्वास।
जहाँ मानवता ही रोए,
व्यर्थ है वहाँ तुम्हारा हास!
लगा लो अपना सारा ज़ोर,
न होगा मुझको अब विश्वास...
(३)
मगर चीरकर इस पतझड़ को,
नहीं तुम केवल फूल-विलास।
कभी बन नव चेतन-ज्योति,
जगाती हो सोया विश्वास।
जहाँ निराशा का तम घना,
वहाँ उगाओ नव-प्रभात।
मुरझाए मन के उपवन में,
भर दो नव-जीवन की सौगात।
न भाए केवल रंग-रूप,
न केवल मधु-माधव का गान।
खिले हृदय में करुणा-सुमन,
यही बस माँगूँ मैं वरदान।
यदि तेरे आने से यहाँ,
बदले पतझड़ का यह वेश।
तभी कहूँगा हर्षित हो,
सफल हुआ तेरा संदेश।
बहे अगर ऐसी सुवास,
मिटे मनुजता का संताप।
नवांकुर फूटें हर उर में,
पहचाने मानव अपना आप।
तब आओ हे ऋतुराज बसंत!
बिखेरो अपना मधुर प्रकाश।
जहाँ मनुष्य ही मनुष्य रहे,
वहीं करूँगा मैं विश्वास!
########### शिव प्रकाश मिश्र ###########
(मूल कृति दिसम्बर १९७९ - सर्व प्रथम दैनिक वीर हनुमान औरैय्या में प्रकाशित)
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