Tuesday, February 23, 2016

कौन हूँ मैं ?



कौन हूँ मैं ?

— शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति: १७ जून १९८१ |)


कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा?

न पूछो अभी तक क्या करता रहा!

एक चाहत लिए दाँव रखता रहा,

शह उनकी पे ही मात खाता रहा।

हारकर मैंने खोया नहीं हौसला,

जीत या हार होना नहीं फ़ैसला।

आज अपना कोई बन गया अजनबी,

रोज़ जिसको हृदय में बिठाता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा!


एक पागल पथिक-सा फिरूँ दर-बदर,

कितनी राहें चलीं, कुछ नहीं है ख़बर।

ताक पर आस-सपन सजाता रहा, 

नीर पलकों में अपनी छुपाता रहा।

आज ऐसी कहानी नहीं कह सका,

शब्द जिसके लिए ढूँढ़ता फिर रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (१)


धूप ने हर कदम पर जलाया मुझे,

छाँव ने भी कहाँ फिर बचाया मुझे।

वक्त की आँधियों में बिखरता रहा,

फिर भी उम्मीद लेकर सँवरता रहा।

जो मिला राह में, साथ चलता रहा,

जो गया छोड़कर, याद बनता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (२)


एक दीपक अँधेरों में जलता रहा,

अपनी लौ से स्वयं को ही छलता रहा।

रात भर ख़्वाब की नाव खेता रहा,

भोर होते ही साहिल बदलता रहा।

दर्द को गीत की शक्ल देता रहा,

मौन में भी किसी से मैं कहता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (३)


ज़िंदगी ने कई रग दिखलाए हैं,

कुछ हँसी के, कई अश्रु बन आए हैं।

जो मिले फूल, काँटों समेत ही मिले,

जो मिले लोग, अक्सर बदलते मिले।

फिर भी रिश्तों की माला पिरोता रहा,

टूटकर भी सदा मुस्कुराता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (4)


आईने से कभी जब नज़र मिल गई,

एक अनजान-सी फिर डगर मिल गई।

खोजता था जिसे मैं ज़माने भर,

वो मेरे ही भीतर आकर मिल गई।

खुद को पाने की कोशिश में उम्र भर,

अपने ही प्रश्न का उत्तर बनता रहा,

न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (५)


कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा,

यह सवाल उम्र भर मुझसे उलझता रहा।

ढूँढ़ता था जिसे मैं जहाँ-तहाँ,

वह मेरे ही भीतर ठहरता रहा।

अब न मंज़िल की चाहत, न रस्तों का ग़म,

एक मुसाफ़िर था, बस यूँ ही चलता रहा।

जो लिखा था मुकद्दर ने, सहता रहा,

जो न लिखा था, उसको भी कहता रहा।

अब न पूछो कि क्या खोया, क्या पा लिया,

ज़हर पीकर भी जीवन को गा लिया।

कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा?

न पूछो अभी तक क्या करता रहा!

न पूछो अभी तक क्या करता रहा...॥ (६)

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        - शिव प्रकाश मिश्र
           १७ जून १९८१ 
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