Tuesday, February 23, 2016

बुजर्गों की व्यथा


बुजुर्गों की व्यथा

— शिव प्रकाश मिश्रा

 

(मूल कृति: १२ फरवरी १९८४)

मैं पतझड़ का पेड़ हूँ, 

छाया और हरित-विहीन, 

अपने आप टूट रहा हूँ।

अनगिनत आशाएँ फूली-फलीं कभी, 

और अनगिनत बहारों में, 

आए कितने ही फूल और फल।

 मोहक आकर्षण में जिसके, 

कितने ही पंथियों का था मैं आश्रय-स्थल।

बहारों के साथ काफ़िला खिसक गया,

 प्यार और अपनापन भी छूमंतर हो गया, 

और अब है यहाँ वीरान... 

किसी मरघट-सा सुनसान!

शायद फिर कोई आए, 

अपना हाथ बढ़ाए, 

प्रेम का दिया जलाए, 

और मेरे सूखेपन का श्राप फलित कर जाए!

इस आशा में, थोड़ा-सा ही सही, 

ज़मीन से जुड़ा हूँ मैं, 

और प्रतीक्षा में, सूखा ही सही, 

न जाने कब से खड़ा हूँ मैं...

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  - शिव प्रकाश मिश्र
    १२ फरवरी १९८४
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