बुजुर्गों की व्यथा
— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति: १२ फरवरी १९८४)
मैं पतझड़ का पेड़ हूँ,
छाया और हरित-विहीन,
अपने आप टूट रहा हूँ।
अनगिनत आशाएँ फूली-फलीं कभी,
और अनगिनत बहारों में,
आए कितने ही फूल और फल।
मोहक आकर्षण में जिसके,
कितने ही पंथियों का था मैं आश्रय-स्थल।
बहारों के साथ काफ़िला खिसक गया,
प्यार और अपनापन भी छूमंतर हो गया,
और अब है यहाँ वीरान...
किसी मरघट-सा सुनसान!
शायद फिर कोई आए,
अपना हाथ बढ़ाए,
प्रेम का दिया जलाए,
और मेरे सूखेपन का श्राप फलित कर जाए!
इस आशा में, थोड़ा-सा ही सही,
ज़मीन से जुड़ा हूँ मैं,
और प्रतीक्षा में, सूखा ही सही,
न जाने कब से खड़ा हूँ मैं...
____________________- शिव प्रकाश मिश्र१२ फरवरी १९८४____________________
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