बदनुमा दाग़ हूँ मैं
- शिव प्रकाश मिश्राछोड़ दो साथ अब मेरा, एक बुझता चिराग़ हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।
यही दुर्भाग्य है मेरा, न आ सका काम कुछ तेरे,
दुखों और दर्द के सिवा, क्या था भला पास मेरे।
आज चाहो तो मुझे अंतिम मधुर मुस्कान दे दो,
या जो किसी को न दिया हो, वह अपमान दे दो।
अंधेरी वादियों में भटकता विरह का राग हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।
आत्मा पर बोझ बनकर, चाहकर भी न बोल पाया,
अंतर के घाव रिसते रहे, किसी से भेद न खोल पाया।
आज चाहे इस तपस्या का यहीं अवसान कर दो,
कहूँगा कुछ नहीं, चाहे मुझे बदनाम कर दो।
जो बुझ न सके कभी, ऐसी सुलगती आग हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।
ठोकरों ने ही सिखाया, राह पर कैसे चला जाए,
टूटकर बिखरे बिना भी, दर्द को कैसे जिया जाए।
जिनको दुनिया ने कहा दाग़, वही तो मेरी पहचान हैं,
वक़्त की इस धूप में तपकर बने जीवन के वरदान हैं।
अब न शिकवा है किसी से, न ख़ुद से अजनबी हूँ मैं,
उम्र की इस सांझ में, अपना ही सबसे क़रीबी हूँ मैं।
बुझता चिराग़ नहीं अब, अनुभव का प्रकाश हूँ मैं,
जो समझ सके तो जीवन हूँ, न समझे तो दाग़ हूँ मैं।
— शिव प्रकाश मिश्रा
Tuesday, February 23, 2016
बदनुमा दाग हूँ मै !
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