रिश्ते प्यार के और रस्ते पहाड़ के,
आसान तो बिल्कुल नहीं होते।
कभी आँधी, कभी तूफ़ान, कभी धूप, कभी छाँव,
यहाँ हमेशा साफ़ आसमान नहीं होते।
थोड़ी-सी बेचैनी से अक्सर उमड़ आते हैं सैलाब,
पर आँखें निचोड़ो भी अगर, तो कभी आँसू नहीं होते।
प्यार एक धर्म है मर मिटने का,
जिसके हर कर्म में एक मर्म है,
पर इसके हर कर्म के कोई तय विधि-विधान नहीं होते।
भावनाओं की भी भला, बैलेंस शीट बनाता है कोई?
लाभ भी आनुपातिक ही होगा, ऐसी आस लगाता है कोई?
कौन समझा है यहाँ किसे?
यह समझना बहुत मुश्किल है,
और कोई समझेगा भी तो कितना?
यह तो बस हालात पर निर्भर है।
सच्चाई क्या है?
अब कुछ एहसास नहीं होता,
लगता है अपनी ही नज़र अब काफ़ी कमज़ोर हो चली है।
दिल है बहुत बोझिल,
मगर ग़नीमत है कि कुछ तो है इसमें...
वरना यह पूरा शहर ही बेचैन है,
अपने अकेले और ख़ालीपन में॥
~~~~~ शिव मिश्रा ~~~~~~~~~
Aap ki Kavita ne man ki gahraiyon ko Chu liya.....mabmohak....adbhut....adwitiya....
ReplyDeleteधन्यवाद
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