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Friday, May 1, 2020

एक कंधे की चाहत


एक कंधे की चाहत

— शिव प्रकाश मिश्रा

क्या कभी कोई अपना सिर, 

अपनी ही गोद में रख कर सोया है? 

या अपना सिर, 

अपने ही कंधे पर रख कर रोया है?

क्यों कोई नहीं चाहता कभी— 

अपना सुख-दुःख स्वयं में समेटे रखना, 

अपने में जीना, अपने में मरना, 

और गुमनामी लपेटे रखना?

क्या इसीलिए रिश्ते जन्म लेते हैं, 

और हमेशा हमारे लिए अहम होते हैं?

 रिश्ते... अंकुरित होते हैं, उगते हैं, 

पनपते हैं, बनते हैं या प्रकट होते हैं? 

पता नहीं क्यों, परन्तु हमेशा अच्छे लगते हैं, 

और जरूरी भी!

शायद... कुछ को हम कभी नहीं समझते,

 और कोशिश भी नहीं करते। 

भटकते हैं लिए एक कंधे की चाहत, 

और अपना कंधा खाली रखने की आदत... क्यों?

बने रहना चाहते हैं हम एक ऐसा बीज, 

सब आत्मसात है जिसमें। 

ऐसा रिश्ता— जहाँ जड़, तना और पत्ते, 

सब साथ-साथ हैं जिसमें। क्यों? 

फिर सब मिलकर बनाते हैं एक नन्हा पौधा, 

बढ़ना जिसकी नियति है, 

और बढ़कर दूर-दूर हो जाना, 

या दूर-दूर होकर बढ़ जाना... 

जिसकी परिणति है! क्यों? 

दोहराया जाता है बार-बार— 

यह 'इति-हा-आस'? 

वह 'इतिहास'... जो वास्तव में यहाँ है ही नहीं!



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 -  शिव प्रकाश मिश्रा
 ११ सितम्बर २०१२