Sunday, October 4, 2026

"एक छोटी सी बात - १९८२ से २०२६"

 

"एक छोटी सी बात"

       — शिव मिश्रा

(मूल कृति : मई 1982 का 2026 संस्करण)

 

बात बहुत छोटी थी,

 बस इतनी-सी थी—

कि तुम मुझे अच्छे लगते थे।

न कोई कारण था,

न कोई विशेष बात,

न  इसका कोई स्पष्ट उत्तर था।

बहुत सोचा मैंने—

आखिर क्यों?

पर  कुछ प्रश्न

तर्क से कहाँ सुलझते हैं!

बात बहुत छोटी थी,

बस इतनी-सी बात थी—

कि तुम मुझे अच्छे लगते थे।

न कोई कारण था,

न कोई विशेष बात,

न इसका कोई स्पष्ट उत्तर था।

बहुत सोचा मैंने—

आखिर क्यों?

हर संभव कारण तलाशा,

हर उत्तर को परखा,

फिर भी कुछ समझ नहीं आया।

मन के आगे

तर्क का होता भी क्या भला!

मैंने समझा था—

यह भी एक क्षण होगा,

आएगा...

और चुपचाप गुजर जाएगा। 

लेकिन वह क्षण

ठहर गया कहीं,

शायद मेरे भीतर,

मेरी साँसों के बीच,

मेरी स्मृतियों की किसी अनजानी तह में।

और अब तो हद हो गई है—

वह छोटी-सी बात

इतनी बड़ी हो गई है

कि उसे छोटा कहने में भी

मन झिझकता है।

विवेक मौन है,

मन अशांत है,

और चित्त

किसी अनजाने भय से भरा है।

डरता हूँ—

कहीं यह केवल आकर्षण न हो,

कहीं यह मेरी कल्पना का संसार न हो,

कहीं मैं स्वयं ही

अपने बनाए हुए किसी स्वप्न में

जी तो नहीं रहा हूँ?

पर फिर सोचता हूँ—

यदि यह केवल भ्रम है,

तो इतना सच्चा क्यों लगता है?

यदि यह केवल चाहत है,

तो तुम्हारे दूर होने से

मन इतना खाली क्यों हो जाता है?

आज भी नहीं समझ पाया हूँ

कि स्वयं को क्या हुआ है।

किसी से कह भी नहीं सकता,

क्योंकि शब्दों में बाँधते ही

यह एहसास छोटा पड़ने लगता है।

जो बात इतनी छोटी थी,

वह इतनी बड़ी कैसे हो गई?

शायद बाहर

कुछ भी नहीं बदला—

वही रास्ते हैं,

वही मौसम हैं,

वही लोग हैं,

वही मेरी दुनिया है।

फिर भी

मेरी दृष्टि बदल गई है।

अब वही सुबह

कुछ और कहती है,

वही शाम

कुछ अधिक उदास लगती है,

हवा में भी

जाने किसकी आहट सुनाई देती है।

पहले तुम्हें देखना

अच्छा लगता था,

अब तुम्हें न देखना

अच्छा नहीं लगता।

पहले तुम्हारी याद

एक सुखद एहसास थी,

अब तुम्हारी याद

मेरी आदत बन गई है।

और शायद प्रेम यही है—

जब कोई व्यक्ति

हमारी दुनिया में आता नहीं,

बल्कि धीरे-धीरे

हमारी दुनिया का अर्थ बदल देता है।

पहले तुम

केवल अच्छे लगते थे,

फिर तुम्हारी प्रतीक्षा

अच्छी लगने लगी।

फिर तुम्हारी बातें,

तुम्हारी हँसी,

तुम्हारी चुप्पी—

सब कुछ अपना-सा लगने लगा।

और अब...

अब बात इतनी-सी नहीं रही।

अब तुम्हारे होने से

दुनिया थोड़ी सुंदर लगती है,

और तुम्हारे न होने से

सब कुछ होते हुए भी

कुछ अधूरा-सा लगता है।

शायद बाहर कुछ नहीं हुआ,

पर मेरी तो

पूरी दुनिया ही बदल गई।

पहले तुम

सिर्फ अच्छे लगते थे—

अब तुम्हारे बिना

कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

और सोचता हूँ,

जिसे मैंने कभी

“एक छोटी-सी बात” समझा था,

शायद वही

मेरे जीवन की

सबसे बड़ी बात थी।

— शिव मिश्रा

 ४ अक्टूबर 2026


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