"एक छोटी सी बात"
- शिव मिश्रा
बात बहुत छोटी थी,
और केवल इतनी सी थी,
कि तुम मुझे अच्छे लगते थे।
कभी नहीं जान सका कि क्यों,
सोचा बहुत, पर पता ही नहीं चला,
मन के आगे तर्क का होता भी क्या भला!लेकिन अब तो हद ही हो गई है,
बात बहुत ज्यादा ही बढ़ गई है।विवेक मौन है, मन बहुत अशांत है,
चित्त न जाने किस बात से भयक्रांत है।
आज तक कुछ समझ नहीं पाया हूँ,
स्वयं को क्या हुआ, बता नहीं पाया हूँ।जो बात इतनी छोटी थी,
कैसे इतनी बड़ी हो गई?
शायद बाहर कुछ नहीं हुआ,पर मेरी तो दुनिया ही बदल गई।
सब कुछ पहले जैसा ही होगा पर,मुझे कुछ भी सामान्य नहीं दिखता।
पहले तुम केवल अच्छे लगते थे,अब तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~मूल कृति मई 1982
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