Sunday, September 27, 2026

मौसम सुहाना हो गया है

मौसम सुहाना हो गया है

                   - शिव मिश्रा 

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अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,
कि अब मौसम सुहाना हो गया है।
लगता है कोई अपना आस-पास है,
जिससे मिलने का बहाना हो गया है।
मौसम सुहाना हो गया है,
या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,
अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,
कि अब मौसम सुहाना हो गया है।

(१) 

तुम्हारे घर का कच्चा रास्ता भी,
न जाने क्यों मन को भाने लगा है।
उस पर चलने वाला हर अजनबी भी,
अब जाना-पहचाना सा लगने लगा है।
फूँस का जो छप्पर अखरता था मुझे,
वह भी आँखों को लुभाने लगा है।
गली के छोर का वह झाड़-झंखाड़ भी,
टेसू के फूलों सा खिलने लगा है।
मौसम सुहाना हो गया है,
या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,
अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,
कि अब मौसम सुहाना हो गया है।

(२) 

वो पगडंडी, वो उस पर धूल का उड़ना,
न जाने क्यों बहुत अच्छा लगने लगा है।
दूर से आती किसी अनजान आहट पर,
ये दिल कुछ ज़ोर से धड़कने लगा है।
टहनियों के संग मिल पेड़ भी जैसे,
प्रेम का पल्लव नया सजने लगा है।
अनसुना था किया जिस पवन-शोर को,
आज शांति का संदेश लाने लगा है।
मौसम सुहाना हो गया है,
या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,
अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,
कि अब मौसम सुहाना हो गया है।

 

(३) 

नीम का वह पेड़ जो घूरता था दूर से,
अब मुझे देख कर मुस्कुराने लगा है।
गाँव की हर गली का हर एक कण,
गीत कुछ प्यारा सा गुनगुनाने लगा है।
सांझ ढलने पर ये गाँव प्यारा लगे,
चाँद-तारों की कथाएँ सुनाने लगा है।
भोर की किरणें भी प्यार से सहला रहीं,
मन में उत्साह इक नया जगने लगा है।
मौसम सुहाना हो गया है,
या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,
अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,
कि अब मौसम सुहाना हो गया है।

(४) 

पेड़ पर चिड़ियाँ पुराना गीत ही गा रहीं,
पर गीत उनका मधुर अब लगने लगा है।
पुरवाई ने ली अंगड़ाई ये तो ठीक है,
पर मन पपीहा सा व्याकुल होने लगा है।
बाग में पहले भी खिलते थे सुन्दर फूल,
सौन्दर्य उनका मगर अब निखरने लगा है।
बाट क्यों जोहता हूँ किसी अनजान की,
जिसकी चाहत में ये दिल मचलने लगा है।
मौसम सुहाना हो गया है,
या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,
अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,
कि अब मौसम सुहाना हो गया है।

(५) 

वही चौखट, वही आँगन, वही खिड़की,
आज सब कुछ नया-सा क्यों लगने लगा है।
देख कर भी न देखा था जिस घर को कभी,
आज वह भी बहुत अपना लगने लगा है।
यह नियति का खेल है या कुछ और,
या कोई सपना भी सच होने लगा है।
कुछ नहीं बदला यहाँ, ये तो मालूम है,
पर न जाने मुझे आज क्या होने लगा है।

मौसम सुहाना हो गया है,
या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,
अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,
कि अब मौसम सुहाना हो गया है।


        ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव प्रकाश मिश्रा ~~~~~~~~~

        मूल कृति 15 अगस्त 1985 ( भारतीय स्टेट बैंक की पत्रिका  "हम दोस्त" में प्रकाशित )

     

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