न मैं बोलूँ, न तुम बोलो .. मौन की भाषा
~शिव मिश्रा
न तुम कुछ बोलो, न मैं कुछ बोलूँ,
इस ख़ामोशी में हो जाएँ गुम,
बस एक नज़र से दुनिया देखें,
यूँ ही सदा साथ रहें हम-तुम।
न शब्दों में ढले, न होंठों पर आए,
वह सब कुछ आँखों में दिख जाए,
जो कह न सके, जो सुन न सके,
वह चेहरे पर ही झलक जाए।
शांति का भी इक स्वर होता है,
और मौन बहुत कुछ कहता है;
यह कैसी भाषा है जिसको,
शब्दों की कोई चाह नहीं,
कहना नहीं, समझना है बस,
सुनने का कोई काम नहीं।
जब पुरवाई-सी आती हो तुम,
कुछ सकुचाई, कुछ शरमाई,
बाग़-बगीचा महक उठे यूँ,
जैसे कोई घटा घिर आई;
तन-मन पर अमृत ढलकाती,
क्या जादू कर जाती हो?
ये सावन की बूँदें हैं, या
मधुरस तुम बरसाती हो?
बस यही चाह, भीगता रहूँ
जीवन भर हर मौसम में,
अब न कोई इच्छा कहने की,
न कोई तृष्णा बाकी मन में;
जब साथ हमारे होती हो तुम,
यह मौन मुखर हो जाता है,
मन के सूखे उपवन में भी
फिर से स्पंदन जग जाता है।
लता लजाती और लिपटती,
पेड़ों की पत्तियाँ ठिठकतीं,
बुलबुल रुकती, कोयल सुनती,
मलय-पवन भी तनिक ठहरती;
उन्हें देख लगता है मुझको,
शायद तुम कुछ कहने वाली हो,
पर कहने-सुनने को क्या बचता,
जब इतना सब कह जाती हो!
— शिव मिश्रा
(मूल कृति: २० जनवरी १९८८)
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