आतंकी प्यास
प्यास से व्याकुल एक व्यक्ति ने
एक घर का दरवाज़ा खटखटाया।
एक कवि-नुमा चेहरा बाहर आया,
जिसे देखकर वह व्यक्ति बोला—
‘प्यासा हूँ, अगर... पानी...!’
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं!” कहकर कवि ने,
उसे ड्राइंग रूम में बैठाया,
ख़ुद बैठकर बोला—
कल भी मैं प्यासा था,
आज भी मैं प्यासा हूँ,
सब कुछ आस-पास है,
फिर भी दिल उदास है,
न जाने कैसी प्यास है?
प्यासे व्यक्ति को बात समझ नहीं आई,
कवि ने बात थोड़ी आगे बढ़ाई—
"वह था ग्यारह सितंबर,
अमेरिका पर आतंकी क़हर!
उसी के अपहृत विमानों को
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकरा दिया,
एक सौ दस मंज़िली बिल्डिंग को धूल में मिला दिया।
हज़ारों सिसकियाँ मलबे में दफ़्न हो गईं,
समूचे विश्व की आत्मा दहल गई।
कौन थे हमलावर?
क्या उद्देश्य था?
इसका आभास है,
न जाने कैसी प्यास है?"
प्यासा व्यक्ति घबड़ाया,
उसे लगा कि कवि उसकी बात समझ नहीं पाया।
उसने सोचा विज्ञापन की भाषा में समझाए,
शायद कवि समझ जाए!
यह सोचकर बोला—
“ये दिल माँगे मोर!”
कवि ने कहा—“श्योर!”
और बोला—
वे पूरी दुनिया की करते थे निगरानी,
पर अपने घर की बात न जानी।
चार-चार विमान एक साथ अपहृत हो गए,
दुनिया के सुरक्षिततम पेंटागन पर हमले हो गए!
अब आतंकी साए में आतंकियों की तलाश है,
न जाने कैसी प्यास है?
प्यासा व्यक्ति चिल्लाया— “ओह नो!”
कवि बोला—“यस
इतिहास गवाह है,
जो भस्मासुर बनाता है,
वह उसी के पीछे पड़ जाता है।
आतंकवाद का दर्द भी तभी समझ में आता है,
जब कोई स्वयं इसकी चपेट में आता है।
आतंकवाद से लड़ने के लिए वे उसी के साथ खड़े हैं,
जिसके तार आतंकवादियों से जुड़े हैं!
आतंकवाद से लड़ने का यह अधूरा प्रयास है,
न जाने कैसी प्यास है?"
प्यासा व्यक्ति निढाल हो सोफ़े पर लुढ़क गया,
यह देख कवि-पत्नी का हृदय पिघल गया।
बोली—
"न आप अमेरिका हैं,
न पाकिस्तान,
न रूस हैं,
न अफ़ग़ानिस्तान!
आप भारत हैं,
और भारत को दूसरों की आस छोड़नी होगी,
और आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी होगी।
इस बेचारे को नाहक सता रहे हो,
पानी की जगह कविता पिला रहे हो!
यह मूर्छित व्यक्ति कोई और नहीं,
स्वयं ओसामा बिन लादेन है...
क्या इसका तुम्हें एहसास है?
न जाने कैसी प्यास है?
न जाने कैसी प्यास है?"
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- शिव मिश्रा
( मूल कृति २ अक्टूबर 2001)
हम दोस्त पत्रिका में प्रकाशित