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Thursday, June 18, 2026

"लेकिन तुम नहीं हो"

 

ग़ज़ल

"लेकिन तुम नहीं हो"

वही हवाएँ हैं लेकिन तुम नहीं हो,
वही फ़िज़ाएँ हैं लेकिन तुम नहीं हो।

ये सर्द रात कहती है बार-बार मुझसे,
सभी तो हैं यहाँ, लेकिन तुम नहीं हो।

कोहरे में ढूँढ़ता हूँ आज भी मैं एक चेहरा,
लगता है पास हो, लेकिन तुम नहीं हो।

वही पहाड़, वही रास्ते, वही सुबह की धूप,
सब कुछ तो है यहाँ, लेकिन तुम नहीं हो।

जहाँ कभी तुम्हारी हँसी गूँजती थी शाम-ओ-सहर,
वहाँ अब सन्नाटा है, लेकिन तुम नहीं हो।

हाथों में हाथ लेकर जो देखे थे ख़्वाब हमने,
वो ख़्वाब तो ज़िंदा हैं, लेकिन तुम नहीं हो।

हर एक मोड़ पर तेरी ही याद ठहर जाती है,
सफ़र तो चल रहा है, लेकिन तुम नहीं हो।

ये सूनी वादियाँ तेरा नाम पुकारती हैं,
हवाओं में सदाएँ हैं, लेकिन तुम नहीं हो।

किसी दरख़्त की ओट में, किसी धुँधले से मंज़र में,
लगता है मुस्कुराओगे, लेकिन तुम नहीं हो।

मैं जानता हूँ कड़वा सच, मैं मानता हूँ इसको,
तुम अब कहीं नहीं हो, लेकिन तुम नहीं हो।

ये दिल भी क्या अजब है, यक़ीन फिर भी नहीं करता,
सामने सच खड़ा है, लेकिन तुम नहीं हो।

यादों की धीमी आँच पर अब भी सुलगता हूँ,
मेरे साथ इश्क़ है, लेकिन तुम नहीं हो।

न जाने वक़्त ने क्यों ऐसी करवटें बदलीं,
वही मैं आज भी हूँ, लेकिन तुम नहीं हो।

'शिव' आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है चुपचाप,
जहाँ बिछड़े थे हम, लेकिन तुम नहीं हो।