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Friday, February 18, 2022

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे ?

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

                  — शिव मिश्रा

                                            ~~~~~~~~~~~~~~~

 

१. 

कब जले थे दीप, हम देख ही न पाए,

कैसी थी वह ज्योति, जो तम मिटा न पाए

रात्रि गहरी थी बहुत, दृष्टि सोती रही,

ज्योति जो आई भी तो, यूँ ही खोती रही।

स्वविवेक का दीप हमने बुझा दिया,

आस्था के आँगन को धुआँ बना दिया।

लुट गया सब कुछ, किंतु हम मौन थे,

सम्मुख मुखड़े तो थे, फिर भी कौन थे?

किसके मन में क्या छिपा, पहचान न पाए,

अपने ही भीतर के तम को जान न पाए।

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

जब नयन ही अश्रुधार में ढलेंगे!

 

२. 

इस ओर हम तिमिर के बंदी बने हुए हैं ,

उस ओर उजास के प्रहरी तने हुए हैं।

मध्य में खड़ी है विभाजन की प्राचीर,

एक ओर अधिकार, दूजी ओर पीर।

उधर प्रासादों में सजती दीप-मालिकाएँ हैं,

इधर कुटिया में बुझती सी चिंगारियाँ हैं।

कहीं उत्सव है, कहीं क्षुधा का घेरा,

कहीं चंद्रिका है, कहीं रात्रि का अँधेरा।

दीपावली के दीप हों, या फागुन के रंग,

किसके भाग आएगी जीवन की ये उमंग?

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

जब नयन ही अश्रुधार में ढलेंगे!

 

३. 

स्वार्थ की आँच पर रोटियाँ सिकती रहीं,

न्याय की डगर निरंतर बिकती रहीं।

सत्य के हर एक स्वर को दबाया गया,

मौन को ही श्रेष्ठ धर्म बतलाया गया।

कब तलक हम वेदना पीते रहेंगे?

कब तलक अन्याय चुपचाप सहेंगे?

किसलिए अधरों पे ताले पड़ गए?

किसलिए सच बोलने से डर गए?

बिन तेल, बिन बाती, दीपक जले कैसे?

मन में तम हो तो प्रकाश पले कैसे?

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

जब नयन ही अश्रुधार में ढलेंगे!

 

४. 

किसी के भाग रोटी, किसी के भाग घाव,

किसी के भाग धूप, किसी के भाग छाँव।

किसी की मुट्ठियों में स्वप्नों का संसार,

किसी के नयनों में पलती प्रतीक्षा अपार।

क्यों किसी के श्रम का अधिकार छीना जाए?

क्यों किसी का बचपन क्षुधा में जीया जाए?

क्यों मनुष्य ही मनुष्य से दूर रहे?

क्यों प्रेम के आँगन में इतने भेद रहें?

जाति की शृंखला हो, या धर्म की ओट,

मानवता पर क्यों पड़ती रहे चोट?

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

जब नयन ही अश्रुधार में ढलेंगे!

 

५. 

जब तक मन से मन की दूरी रहेगी,

तब तक हर एक ज्योति अधूरी रहेगी।

न कोई छोटा हो, न कोई बड़ा,

न किसी के भाग्य में हो तिमिर जड़ा।

हर हाथ को श्रम का सम्मान मिले,

हर क्षुधित को अन्न, तृषित को नीर मिले।

हर शिशु को स्वप्नों का आकाश मिले,

हर निर्बल को न्याय का विश्वास मिले।

हर देहरी पर आशा का सुमन खिले,

हर जीवन को जीने का अधिकार मिले।

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

जब नयन ही अश्रुधार में ढलेंगे!

 

६. 

आओ, अब अपने अंतर्मन में झाँकें,

बुझते दीपों के कारण को आँकें।

पहले अपने मन का तम मिटाएँ,

सोए हुए विवेक को फिर से जगाएँ।

औरों की पीड़ा को अपना बनाएँ,

गिरते हुए मनुज को हाथ बढ़ाएँ।

एक दीप तुम जलाओ, एक दीप हम जलाएँ,

मिलकर प्रेम का नूतन प्रभात लाएँ।

दीप से दीप जले, अब यह क्रम चले,

द्वेष का हिमशिखर भी आज फिर गले।

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

जब नयन ही अश्रुधार में ढलेंगे!

 

७. 

किंतु जब तक किसी का नयन नम रहेगा,

जब तक किसी के आँगन में अभाव रहेगा,

जब तक न्याय के पथ अवरुद्ध रहेंगे,

जब तक स्वप्नों के स्वर क्रुद्ध रहेंगे,

जब तक भूख किसी गृह में पलती रहेगी,

जब तक विवशता नयनों से ढलती रहेगी,

जब तक मनुजता प्रश्नों में घिरेगी,

जब तक मानवता प्राचीरों में बँटेगी,

तब तक यह प्रश्न मन में शूल बन चुभेगा,

हर उत्सव की ओट में कोई अश्रु बहेगा।

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

जब नयन ही अश्रुधार में ढलेंगे!

कैसे हम सबके दीपक जलेंगे?

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                             रचनाकार : शिव मिश्रा 

  मूलकृति : अक्टूबर 2016