एक छोटी-सी बात
शिव प्रकाश मिश्र
बात बहुत ही छोटी थी,
बस इतनी-सी बात थी,
तुम मुझे अच्छे लगते थे,
मन में इतनी बात थी।
पहले तुम केवल अच्छे लगते थे,
अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
(1)
समझ न पाया आज तलक,
मन क्यों तुममें खो गया,
सोचा बहुत, विचार किया,
यह क्या से क्या हो गया।
हृदय के आगे बुद्धि भला,
अपनी बात कहाँ कह पाती,
तर्क जहाँ थककर रुक जाते,
भावना बहुत आगे बढ़ जाती।
पहले तुम अच्छे लगते थे,
अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
(2)
कब सीमाएँ टूट गईं,
कब मन इतना बढ़ गया,
शांत हृदय के सागर में,
कैसा तूफान उमड़ गया।
विवेक मौन है अब मेरा,
मन किसी की सुनता नहीं,
तुम्हारे सिवा अब कोई
सपनों में भी दिखता नहीं।
पहले तुम अच्छे लगते थे,
अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
(3)
बाहर की दुनिया में शायद,
कुछ भी न बदला हो लेकिन ,
भीतर का मौसम बदल गया,
मन पहले जैसा रहा नहीं।
संभव है सब पहले जैसा ही हो
मुझको सामान्य नहीं लगता,
पहले तुम अच्छे लगते थे,
अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~
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Sunday, October 4, 2026
तुम बिन कुछ अच्छा नहीं लगता
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