Saturday, March 21, 2020

दो आंखें


"दो आंखें"

दो आँखें

— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: २८ मई १९८०)


दो आँखें, निरंतर मेरा पीछा करती हैं। 

हड़बड़ाहट और बेचैनी में, 

एक अधजली सिगरेट-सी छोड़ देता हूँ अपनी यादें, 

रह-रह कर जो मेरे अंदर बुझती हैं और फिर सुलगती हैं।

मसल देता हूँ कभी खुद ही उन्हें, 

दिन में कई बार अपलक  निहारना चाहता हूँ जिन्हें। 

धुएँ की तरह खो जाती है उनकी बहुमूल्य जवानी, 

स्वतंत्र अस्तित्व, और बिखरी हुई सजी-संवरी कहानी।

शब्दों की सांत्वना में मिलती हैं समाज की भोंडी सलाखें! 

मूक हूँ, निगूढ़ हूँ, वहीं खड़ा हूँ मैं... 

और मेरे पीछे हैं, वही दो आँखें।

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      - शिव प्रकाश मिश्रा 
        मूल कृति - २८ मई १९८० 

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