भीड़
— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति: १८ फरवरी, १९८३ — सर्वप्रथम 'स्वतंत्र भारत' कानपुर में प्रकाशित)
चारों तरफ भीड़ है, मनुष्यों का रेला,
सड़कों पर बिखरा है जो शोरगुल, उसमें खड़ा हूँ मैं।
किसी को पुकारता हूँ, पर—
मेरी आवाज़ इस शोर में घुल रही है,
शायद कोई सुन नहीं सकता!
रूप, रंग, गंध और बोली-भाषा... सब नकली है,
यहाँ कोई मिल नहीं सकता, कोई समझ नहीं सकता।
सब यह कैसे करते हैं?
इतनी बनावट और इतनी मिलावट, आखिर कैसे सहते हैं?
नहीं चाहता कि कोई मुझे प्यार करे,
पर मेरी भावनाओं का कोई तिरस्कार न करे।
ज़रूरी नहीं कि कोई मेरा अनुयायी हो,
मैं भी चल सकता हूँ उसके पीछे, उसके साथ...
बस कोई तो हो, जो मुझे समझे और समझाए,
पर व्यर्थ के विचार मुझ पर न लादे!
क्योंकि... मुझे रोशनी चाहिए,
सिर्फ़ चमक नहीं....
******************- शिव प्रकाश मिश्रा******************मूल कृति १८ फरवरी, १९८३(सर्व प्रथम स्वंतंत्र भारत कानपुर में प्रकाशित)
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