भविष्य ......
— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति: १० सितम्बर १९८० — सर्वप्रथम 'स्वतंत्र भारत' कानपुर में प्रकाशित)
भविष्य (संपूर्ण कविता)
भाग (१)
कैसे मुस्कान हो?
निरुद्वेग अधरों पर,
बादलों-सा मिलना,
निकलना भी छूट गया।
जीवन के कतिपय अंश,
स्वस्ति के लिए हव्य,
आशातीत बेड़ा एक,
सपने-सा टूट गया।
कच्ची पगडंडी-सी,
किस्मत की रेखाएँ,
धूमिल आशाओं में,
वर्तमान भटक गया।
अतीत के दलदल में
डूबती रहीं तस्वीरें,
कल्पना का यान,
जीर्ण दूब में अटक गया।
शक्ति के समन्वय में,
शांति के प्रणेता से,
वर्षों का खोटा सिक्का,
गाँठ से निकल गया।
भाग (२)
किन्तु समय का रथ
रुकता नहीं पलों में,
अंधकार का पहरा
प्राची से हट गया।
टूटी हुई शिलाओं में
अंकुर की आकांक्षा,
पत्थर का मौन भी
हिमगिरि-सा पिघल गया।
राख की परतों में
दबी हुई चिंगारी,
साधना का दीप
स्वयं ही जल गया।
थके हुए चरणों को
पथ ने पुकारा तो,
संघर्ष का संगीत
मन में ढल गया।
भाग्य की लकीरों से
कर्म ही प्रधान हुआ,
पुरुषार्थ का सूरज
क्षितिज पर निकल गया।
विपदाओं के वन में
संकल्प का वटवृक्ष,
आँधियों से जूझकर
और भी अडिग हुआ।
स्वार्थ के बाजारों में
सत्य अकेला सही,
काल के तराजू पर
वही स्वर्ण-सा खरा हुआ।
पीड़ा के प्रसूनों से
सुगंध जब निकलती,
तब जीवन का अर्थ
मौन में बदल गया।
कल की परिधि पर
उषा का प्रथम स्पर्श,
तम का घना साम्राज्य
क्षण भर में ढल गया।
भविष्य, कोई दान
भाग्य का नहीं होता,
कर्म का प्रत्येक बीज
कल्पवृक्ष बन गया।
अब मुस्कान फिर
निरुद्वेग अधरों पर,
जीवन का विश्वास
स्वयं से ही मिल गया।
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- शिव प्रकाश मिश्रा
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मूल कृति १० सितम्बर १९८०
(सर्व प्रथम स्वतंत्र भारत कानपुर में पकाशित )
bahut jordaar
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