पहली बात ...आख़िरी बार
— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति: २८ जून १९८०)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मर चुका हूँ मैं कभी का,
मातम नहीं मनाता कोई।
जिज्ञासु-सा ख़ुद रो रहा हूँ,
ढाँढस नहीं बँधाता कोई।
मेरी लाश न जाने कब से अकेली पड़ी है,
सुनते सभी हैं, समझते सभी हैं,
पर किसी को आने की ज़रूरत क्या पड़ी है?
जो कोई निःस्वार्थ भाव से पास आए,
मनुष्यत्व, अपनत्व या कोरी औपचारिकता ही निभाए,
और मेरी लाश पर... मेरा ही कफ़न ओढ़ाए!
यद्यपि हमें कोई संक्रामक रोग नहीं है,
पर हमारा उनसे अब कोई योग तो नहीं है।
सामाजिक मर्यादाओं की रक्षा ही तो की थी मैंने,
भ्रष्टाचार का विरोध कर, संस्कार विकसित करने की जिद की थी मैंने!
पर पाखंड से भरी इस दुनिया को यह रास न आया,
मेरी निष्ठा को इन्होंने महज़ एक 'वितंडा' बताया।
तभी तो कहते हैं वे, “सिरफिरा हूँ मैं”,
यद्यपि उन्हीं के संस्कारों के लिए मरा हूँ मैं!
और फिर मर सकता हूँ कई बार उन सबके लिए,
पर क्या कोई उनके लिए... या अपने लिए भी,
दोबारा जीने की कल्पना कर सकता है? अपने लिए?"
***************************
शिव
प्रकाश मिश्रा
मूल
कृति २८ जून १९८०
***************************
No comments:
Post a Comment