Sunday, March 22, 2020

लक्ष्मण - रेखा

लक्ष्मण-रेखा

— शिव प्रकाश मिश्रा 

(मूल कृति: १७ अप्रैल १९८१ — सर्वप्रथम 'दिनरात' इटावा में प्रकाशित)

आज मैं उपेक्षित हूँ, 

समाज के घेरे से बाहर खड़ा,

 क्षुब्ध हो सोचता हूँ। 

कितनी विषैली पर वास्तविकता है यह! 

विस्मय, विषाद या उपेक्षा में... मैं सोचता हूँ।

भावनाओं में कुछ ज़्यादा ही बह गया था मैं, 

या किसी ने अपने विचारों में, जान-बूझकर, 

इतना ऊँचा उठा दिया था मुझे— 

कि गिरकर मैं फिर उठ भी न सकूँ, 

और उनकी ज़्यादतियों का प्रतिकार भी न कर सकूँ!

मैं गिरा तो ज़रूर, पर उठकर चल पड़ा शीघ्र ही,

 मैं तैयार था इसलिए, जो हुआ उसके लिए। 

तभी तो आज मेरा यह तिरस्कार हुआ है, 

मेरी हर हसरत पर उन्हें संशय है।

कहीं मैं कोई वितंडा न बना दूँ? 

उनके कलमष की कहानी होठों पर न ला दूँ? 

तभी तो करते हैं वे हर रोज़ एक नई व्यूह-रचना! 

क्या यही लक्ष्मण-रेखा है?

 या महज़ एक कोरी विडंबना?


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 - शिव प्रकाश मिश्रा
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       मूल कृति १७ अप्रैल १९८१
( सर्वप्रथम दिनरात इटावा में  प्रकाशित)


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