Sunday, July 19, 2026

पता ही नहीं चला..... कब .....? बच्चे बड़े हो गए


सुबह उगती है, 

और शुरू हो जाती है, 

चहचहाहट घोंसले में, 

जो मेरे बगीचे में बना है, 

और जिसे मैं देखता हूँ, 

खिड़की से झांक कर हर रोज.

शाम को फिर बढ़ जाती है हलचल चहचहाने की, 

आहट भी नहीं होती है, 

रात गहराने की.

हर दिन ऐसे ही शुरू होता है,

और हर रात भी, 

कुछ इसी तरह.

पता नहीं, 

इनके पास हैं 

कितनी खुशियाँ? 

अनमोल पल? 

कितनी तरंगें?

 कितनी उमंगें?

इनके ऊर्जा पात्र 

जैसे अक्षय हो गए हैं, 

हर चीज को मानो पंख लग गए हैं.

एक जोड़ा चिड़ियों का और उनके दो छोटे बच्चे, 

यही सब उनका पूरा संसार बन गए हैं. 

जो देते हैं अविरल, 

अतुल अहसास, 

जैसे सृष्टि का सृजन और क्रमिक विकास.

हर तरफ हरियाली, 

मनमोहक हवाएं 

स्वच्छ खुला नीला आकाश, 

अबोध-विस्मय, 

तार्किक-तन्मय, 

संयुक्त आल्हाद और अति विश्वास.

स्वयं का, 

प्रकृति का, 

या परमात्मा का, 

पता नहीं, 

पर न गर्मी का गम, 

न चिंता सर्दी की,

 न वर्षा का भय, 

न आशंका अनहोनी की,

 व्यस्त और मस्त हरदम,

 बच्चों के साथ,

जैसे बच्चे ही जीवन हैं, 

उनका, 

बच्चों का पालन-पोषण, 

हर पल ध्यान रखना, 

बड़े से बड़ा करना,

 लक्ष्य है उनके जीवन का.

सोना, 

जागना, 

खेलना,

 कूदना, 

उनके साथ,

 खुश रखना, 

खुश रहना साथ-साथ, 

उनके बचपन में समाहित करना, 

अपना जीवन, 

पुनर्परिभाषित और पुनर्निर्धारित करना, 

खुद का बचपन.

कितने ही मौसम आए, 

गए, 

समय के बादल भी उमड़े-घुमड़े और बरस कर चले गए.

खिड़की से बाहर बगीचे में,

 अब, 

जब मैं झांकता हूँ,

 तो पाता हूँ, 

घोंसले हैं,

 कई हैं, 

आज भी, 

और चहचहाहट भी, 

उसी तरह कुछ-कुछ,

पर सामान्य नहीं है, 

सब कुछ, 

उस घोंसले में, 

जिसे मैं लंबे समय से देखता आया हूँ,

 जिसकी चहचहाहट शामिल थी,

 मेरी दिनचर्या में, 

जिसकी यादें आज भी रची-बसी हैं, 

मेरे अंतर्मन में.

ऐसा लगता है, 

जैसे मैं स्वयं अभिन्न हिस्सा हूँ, 

उनके जीवन का, 

और उस घोंसले का, 

या वे सब और वह घोंसला, 

यथार्थ है, 

मेरे जीवन का.

आज भी जीवित है, 

चिड़ियों का वह प्रौढ़ जोड़ा, 

और रहता भी है, 

उसी घोंसले में, जहाँ अब चहचहाहट नहीं है,

 कोई हलचल भी नहीं है.

चलते, 

फिरते, 

उठते-बैठते,

 झांकता हूँ मैं,

 बार-बार उसी घोंसले में, 

जहाँ अब बच्चे नहीं हैं.

मूक दृष्टि से पूछता हूँ मैं, 

जब इस जोड़े से, 

जो मिलते हैं यहाँ-वहाँ बैठे हुए, 

गुमसुम, 

बहुत शांत और उदास से,

उनकी खामोश निगाहें,

कहती हैं बड़ी बेचैनी से, 

“बच्चे बड़े हो गए", 

"... बहुत दूर हो गए",

"अब तो उनकी चहचहाहट भी यहाँ नहीं आती है”

 "आती है तो सिर्फ उनकी याद आती है"

बहुत व्यथित हूँ, 

विचलित हूँ, 

और सोचता हूँ, 

जैसे कल की ही बात है, 

सारा घटनाक्रम आत्मसात है,

पर मुट्ठी में बालू की तरह,

 समय को भी कोई संभाल सका है भला?

पता ही नहीं चला..... 

कब .....? 

बच्चे बड़े हो गए.

**************************


-    - शिव प्रकाश मिश्रा 

  मूल कृति - सितम्बर २०१३ 

भीग जाना चाहिए... (गीत)

 

भीग जाना चाहिए...  (गीत)

— शिव प्रकाश मिश्र


कड़कती सर्दी हो, धधकती गर्मी हो,

आँधी हो या फिर तूफ़ान हो,

सावधानी से जीना अच्छी बात है...

मगर जब सावन की बहार हो,

रिमझिम-सी फुहार हो,

मन का सूना आँगन भी गुलज़ार हो...

तो फिर भीग जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।

 

हर पल सहमे-सहमे जीना,

जीवन की पहचान नहीं।

सिर्फ़ साँसों का बोझ उठाना,

जीने का सम्मान नहीं।

अनजानी राहों में,

संघर्ष की बाँहों में,

संभलकर चलना अच्छी बात है...

मगर जब दिल आवाज़ लगाए,

सपना सच होने को आए...

तो फिर दौड़ जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।



मगर जब सावन की बहार हो...

रिमझिम-सी फुहार हो...

मन का सूना आँगन भी गुलज़ार हो...

तो फिर भीग जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


हर लम्हे का कोई तर्क नहीं,

हर सपने का कोई मोल नहीं।

जो अपने दिल की सुन न सके,

उससे बड़ा कोई शोर नहीं।

वक़्त के थपेड़ों में,

जीवन के झमेलों में,

चुप रह जाना अच्छी बात है...

मगर जब अपनों की दरकार हो,

रिश्तों को बस प्यार हो...

तो फिर झुक जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


दीपक आँधी से लड़ता है,

नदी चट्टानों को चीर निकलती है।

जो जोखिम से नाता रखते,

मंज़िल उनके कदम चूमती है।

पथरीली राहों में,

अँधेरी रातों में,

सतर्क रहना अच्छी बात है...

मगर जब उम्मीद का सूरज हो,

जीवन का एक  नया सवेरा  हो...

तो फिर मुस्कुराना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


सर्द हवाएँ थम जाती हैं,

पतझड़ भी बीत ही जाता है।

जो जड़ों से जुड़े रहते हैं,

उनका जीवन खिल जाता है।

अपने दायरों में,

अपने फैसलों में,

संतुलित रहना अच्छी बात है...

मगर जब ख़ुशियों का मौसम हो,

प्यार का पहला आलम हो...

तो फिर बाँहें फैलाकर

झूम जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


हर पल बचते रहना भी

कोई जीना नहीं होता।

कुछ बारिशें भी ऐसी  होती हैं,

जो भीगने के लिए ही आती हैं।

कुछ रिश्ते झुकने से बचते हैं।

कुछ सपने दौड़ने से मिलते हैं।

कुछ मंज़िलें मुस्कुराने से मिलती हैं।

और...

कुछ ज़िंदगियाँ

दिल खोलकर जीने से बनती हैं।

इसलिए...

जब सावन की बहार हो,

रिमझिम-सी फुहार हो,

मन में प्रेम का विस्तार हो...

तो फिर भीग जाना चाहिए...

खुलकर जी जाना चाहिए...

दिल से जी जाना चाहिए...

~~शिव मिश्रा ~~~

Monday, June 29, 2026

आसान नहीं होते

 

ग़ज़ल

आसान नहीं होते

— शिव प्रकाश मिश्रा

रिश्ते प्यार के और रास्ते पहाड़ के,
यारो, कभी भी आसान नहीं होते।

कभी आँधी, कभी तूफ़ाँ, कभी धूप, कभी छाँव,
हर सफ़र के सभी मौसम मेहरबान नहीं होते।

बरसों की बर्फ़ पिघले तो कहीं राह निकलती है,
दिलों के फ़ासले यूँ ही दरमियान नहीं होते।

पगडंडियाँ ही अक्सर चोटी तक पहुँचाती हैं,
हर रास्ते के हिस्से कारवाँ नहीं होते।

चट्टानें चुप हैं, इसका ये मतलब नहीं यारो,
पहाड़ों के भी सीने बेज़ुबान नहीं होते।

जो साथ चल न पाए, उसे इल्ज़ाम क्या देना,
हर पाँव के मुक़द्दर एक समान नहीं होते।

मोहब्बत इश्क़ है, सौदा नहीं ऐ अहल-ए-दुनिया,
दिलों के बीच रिश्ते कारख़ान नहीं होते।

कभी ख़ुद को भी रिश्तों की तराज़ू में रख लेना,
हमेशा दूसरे ही बदगुमान नहीं होते।

जो ख़ामोश हैं, ज़रूरी नहीं बेज़ुबाँ ही हों,
समंदरों के हर पल तूफ़ान नहीं होते।

जो दिख रहा है वही सच हो, ज़रूरी तो नहीं यारो,
हर मुस्कुराते चेहरे शादमान नहीं होते।

रिश्तों की हिफ़ाज़त में कई मौसम गुज़रते हैं,
मकाँ बन तो बहुत जाते हैं, लेकिन घर नहीं होते।

दिल बहुत बोझिल है, फिर भी यही ग़नीमत है,
पत्थरों के शहर में सब पत्थर-दिल इंसान नहीं होते।

मक़ता

'शिव' रिश्ते भी पहाड़ों की तरह होते हैं,
दूर से जितने सरल दिखें, उतने आसान नहीं होते।

रिश्ते पहाड़ों जैसे होते हैं

 

रिश्ते पहाड़ों जैसे होते हैं

— शिव प्रकाश मिश्रा

रिश्ते प्यार के और रास्ते पहाड़ के,
यारो, कभी भी आसान नहीं होते।

पहली नज़र में जितने सुंदर दिखते हैं,
उतने सरल उनके अभियान नहीं होते।

कभी धूप तपाती है, कभी बादल घिर आते,
जीवन के सब मौसम मेहरबान नहीं होते।

बर्फ़ पिघलती है तब जाकर झरने गाते हैं,
रिश्ते भी इक पल में वरदान नहीं होते।

पगडंडी ही अक्सर शिखरों तक ले जाती है,
हर चौड़ी सड़क के ऊँचे सम्मान नहीं होते।

जो चुप हैं, वे भी अपने भीतर बहुत कुछ रखते हैं,
पत्थर भी हर बार बेजान नहीं होते।

झरनों की हँसी के पीछे वर्षों का संघर्ष छिपा है,
सुख के पीछे कितने तूफ़ान नहीं होते।

कभी स्वयं को भी दूसरों की जगह रखकर देखो,
सारे दोष हमेशा औरों के नाम नहीं होते।

मकान बनाना तो आसान है इस दुनिया में,
लेकिन हर आँगन सचमुच घर नहीं होते।

दिल की हर पीड़ा का अपना इतिहास रहा करता है,
हर आँसू के पीछे केवल अवसान नहीं होते।

पत्थरों के इस कठोर समय में भी विश्वास रखो,
हर इंसान के भीतर पत्थर प्राण नहीं होते।

समापन

'शिव' रिश्ते पहाड़ों जैसे ही होते हैं—
जितने ऊँचे, उतने धैर्यवान;
जितने कठोर, उतने ही जीवनदायी;
और दूर से जितने सरल दिखें,
उतने आसान नहीं होते।

Monday, June 22, 2026

रिश्ता… टूट रहा …!

 

 रिश्ता… टूट रहा …!

गीतकार : शिव प्रकाश मिश्रा


मन भटकता है रह-रहकर, जाने कहाँ, जाने कहाँ,

 यादों की उस नदी किनारे, खींच रहा बचपन वहाँ।

 अटूट रिश्ता था जो उससे, आज टूटता-सा लगता है,

 मेरे गाँव की प्यारी नदी का, दिल रूठता-सा लगता है॥1

 


शाम-सवेरे दौड़ा करते, जिसके तट पर हम मतवाले,

 हँसी-खुशी के रंग बिखरते, दिन थे कितने भोले-भाले।

 प्यास लगे तो जल पी लेते, चुल्लू भर या डुबकी खाकर,

 कभी शेर बन दहाड़ लगाते, कभी मछली बन इतराकर।

 छप-छप करते उथले जल में, बालू पर लिखते अफ़साने,

 आज भी मन में गूँज रहे हैं, बचपन वाले वे तराने॥2



रेती पर हम महल बनाते, कागज़ की नावें तैराते,

 चींटी-चींटों को बैठाकर, नदी-सैर हम करवाते।

 सीपी, शंख, रंगीन पत्थर, ढूँढ़-ढूँढ़ कर घर ले आते,

 मिट्टी की उन छोटी खुशियों को, दिल में अपने सदा सजाते।

 कुछ सिक्के अब भी हैं पास, यादों की सौगात बनाकर,

 नदी और मेरे बचपन का, रिश्ता रखते हैं सँजोकर॥3



जब-जब ऊंची बाढ़ें आतीं, लगता सागर घर आया है,

 लहरों के चंचल रेले ने, मन में नव-उमंग जगाया है।

 सरकंडों की छोटी चौकी, हम बाढ़ रोकने को गाड़ें,

 बच्चों वाली ज़िद से अपनी, खुशियों के हम दीप जलाएँ।

 पुल न था फिर भी गाँव हमारा, कभी किसी से कम न था,

 निकसन काका की वह नैया, सबकी उम्मीदों का दम था॥4



बरसों बाद आज लौटा हूँ, उसी पुराने तट की ओर,

 ढूँढ़ रहा हूँ बीते कल को, थामे यादों की मीठी डोर।

 पर जो देखा, मन भर आया, एक गहरा दुख दे गया,

 जीवन देने वाली नदी को, समय यह क्या से क्या कर गया!

 मलिन हुई, कमजोर हुई है, सूखी-सूखी साँसें हैं,

 टूटने लगीं अब इस तट पर, जीवन की सब आशाएँ हैं॥5

 


धीरे-धीरे मुझसे कहती, मेरी बचपन वाली साथी—

 "थक गई हूँ, सूख रही हूँ, सुन लो मेरी व्यथा ज़रा-सी।

 मुझको फिर से जीवन दे दो, मुझको फिर से बहने दो,

 अपने बच्चों के सपनों में, मुझको फिर से रहने दो।"

 अटूट रिश्ता था जो मुझसे, मत टूटने दो उसे पुकारो,

 नदियाँ बचेंगी तो बचेगा, यह संसार हमारा, यारों॥6


मन भटकता है रह-रहकर, जाने कहाँ, जाने कहाँ,

 यादों की उस नदी किनारे, खींच रहा बचपन वहाँ।

 अटूट रिश्ता था जो उससे, मत टूटने दो अब यारों,

 मेरे गाँव की प्यारी नदी को, फिर जीवन दो, ऐ यारों…

 फिर जीवन दो, ऐ यारों… फिर जीवन दो, ऐ यारों…॥7

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                            कोरस 

नदियाँ बचेंगी तो बचेंगे, 

अपने गाँव और संसार,

जल से ही जीवन महकेगा, 

जल से ही होगा उद्धार।

बहती रहे ये जीवनधारा, 

रहे सदा इसका श्रृंगार, 

अटूट रहे अपना रिश्ता,

नदी हमारा ही परिवार ॥

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                         - शिव मिश्रा