Thursday, October 29, 2026

अपना अपना चाँद,

अपना-अपना चाँद

      — शिव मिश्रा


शरद पूर्णिमा का चाँद देखा मैंने,
बहुत पास से—
मन की प्यास और
आशाओं की निरीह आँखों से।

और रोमांचित हुआ यह जानकर
कि वह अनिंद्य सुंदर है,
मनमोहक, आकर्षक है।
उसकी शीतलता में अनंत शांति है,
प्यार है, दुलार है,
अपनेपन का गहरा एहसास है,
प्रेम के अनूठे बंधन में
असीम विश्वास है।

क्या वह सचमुच अमृत की वर्षा करता है?
इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं।
शरद पूर्णिमा का चाँद तो
स्वयं अमृततुल्य प्रतीत होता है।
हम खीर न भी खाएँ,
तो भी अमरत्व उतर आता है भीतर।
तभी प्रश्न उठा—
यह चाँद आख़िर किसका है?

उत्तर मिला—
हर किसी का है,
हर घर का है।
सुखी का है,
दुखी का भी है।
प्रेम का है,
विरह का भी है।
राग का है,
द्वेष का भी है।

किसी को शीतलता देता है,
तो किसी को झुलसाता है।
किसी को पुलकित करता है,
तो किसी को कुंठित करता है।

लेकिन इतना निश्चित है
कि वह सबके मन को भाता है,
क्योंकि चाँद तो ठहरा परम उदार,
सबके प्रति समान है उसका व्यवहार।
हमें वैसा ही लगता है,
जैसा हमारा भाव होता है।
चाँद तो जैसे सबके अंतर्मन में ही होता है,
पर बहुत कम लोगों को इसका एहसास होता है।

इसलिए करवा चौथ के दिन,
दिन भर की प्रतीक्षा के बाद,
जब दर्शन के लिए चाँद को ढूँढ़ा गया,
तो उसने मेरी ओर इशारा कर दिया।

फिर तो जैसे
मैं स्वयं चाँद बन गया।
सात जन्मों का साथ जब माँगा गया,
तो मैंने भी छलनी के पीछे से
अपना चेहरा दिखा दिया।

और चाँद की ओर देखे बिना ही कह दिया—
"जैसे तुम हो मुझमें,
वैसे ही मैं हूँ तुममें।"

यही है चाँद की महानता,
प्रेम के अमृत की वर्षा
और अमृत के प्रेम की विशालता।

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      — शिव मिश्रा

         मूल रचना:  २९अक्टूबर 2026  



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Wednesday, October 28, 2026

अपने अधूरे मन का बोझ


अधूरे मन का बोझ

      — शिव मिश्रा


बहुत कुछ है इस दुनिया में— 

देखने को, 

सुनने को, 

पढ़ने को, 

और करने को।

लेकिन हम— 

भागते रहे, 

हाँफते रहे, 

दिन गिनते रहे, 

और व्यस्त रहे।

खाने की चिंता, 

पीने की चिंता, 

रहने को घर, 

ओढ़ने को वस्त्र, 

बिछाने को बिस्तर।

बस इसी में उम्र खपाते रहे— 

व्यवस्था बनाते, 

अपनी जड़ें जमाते, 

भविष्य सँवारते रहे।

यह सोचकर— 

जब सब सँवर जाएगा, 

जब सारी उलझनें सुलझ जाएँगी, 

तब बहुत समय होगा अपने लिए।

तब करेंगे वह सब, 

जो मन में रह गया; 

फिर से छुएँगे वे सपने, 

जिनसे दिल का नाता रहा।

लेकिन कभी यह न सोचा— 

समय लौटकर आता नहीं, 

बीता हुआ कल फिर हाथ आता नहीं।

बचपन को जवानी में, 

जवानी को बुढ़ापे में,

 फिर से जिया नहीं जा सकता; 

बीते हुए मौसम को 

शाखों पर लौटाया नहीं जा सकता।

अब अपने ही अधूरे मन का 

यह बोझ कैसे सँभालूँ? 

जो स्वयं ही जी न सका, 

उसका हिसाब औरों से कैसे माँगूँ?

हर काम का समय है, 

हर पल का अपना मोल; 

वक्त निकल जाए तो 

खुलते नहीं बीते कल के बोल।

जो करना था, रह गया— 

वह फिर कहाँ से आएगा? 

जो जीवन जी न सके, 

वह मन में याद बनकर रह जाएगा।

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          - शिव मिश्रा 

मूल रचना: जनवरी 2020, मुंबई