Friday, November 6, 2026

"दुनिया मुट्ठी में "

 "दुनिया मुट्ठी में"

     — शिव मिश्रा




तुम साथ हमारे होती हो,
तो बात बड़ी हो जाती है।
दुनिया छोटी हो जाती है,
मेरी मुट्ठी में आ जाती है।       १.


इतना ऊँचा उठ जाता हूँ,
बादलों के पार पहुँचता हूँ।
तारों को भी छू सकता हूँ,
चाँद से बातें कर सकता हूँ।     २.


ऊँचे पर्वत शिखरों को भी,
मैं प्यार से सहला सकता हूँ।
ओस की नन्हीं बूँदों को भी,
हाथों में ही ढक सकता हूँ।     ३. 


सागर कहाँ सहन करता यह,
ऊँचा उठने की हठ करता।
उठता, गिरता और संभलता,
सुख की सीमा नहीं समझता।    ४. 


रात्रि भले नीरवता लाकर,
प्रतिदिन मुझे सुलाती है।
ऊषा सिंदूरी थाल सजाकर,
नियमित मुझे जगाती है।        ५. 

मेरे साथ तुम्हारा होना,
सावन की फुहार बताती है।
फूलों की महक तो हर पल,
संदेश तुम्हारा लाती है।          ६. 


गर्मी, सर्दी और बारिश भी,
केवल यह याद दिलाती हैं।
तुम यहीं कहीं हो आसपास,
मीठा आभास कराती हैं।        ७. 


साथ तुम्हारा  होने से,
कितना कुछ बदल जाता है।
साधारण सा यह जीवन भी,
अत्यंत असाधारण हो जाता है।  ८. 

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                - शिव मिश्रा 


 

Thursday, October 29, 2026

अपना अपना चाँद,

अपना-अपना चाँद

      — शिव मिश्रा


शरद पूर्णिमा का चाँद देखा मैंने,
बहुत ध्यान  से—
मन की प्यास और
आशाओं की निरीह आँखों से।

और रोमांचित हुआ यह जानकर
कि वह अनिंद्य सुंदर है,
मनमोहक, आकर्षक है।
उसकी शीतलता में अनंत शांति है,
प्यार है, दुलार है,
अपनेपन का गहरा एहसास है,
प्रेम के अनूठे बंधन में
असीम विश्वास है।

क्या वह सचमुच अमृत की वर्षा करता है?
इसमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं।
शरद पूर्णिमा का चाँद तो
स्वयं अमृततुल्य होता है।
हम खीर न भी खाएँ,
तो भी अमरत्व उतर आता है भीतर।
तभी प्रश्न उठा—
यह चाँद आख़िर किसका है?

उत्तर मिला—
हर किसी का है,
हर घर का है।
सुखी का है,
दुखी का भी है।
प्रेम का है,
विरह का भी है।
राग का है,
द्वेष का भी है।

किसी को शीतलता देता है,
तो किसी को झुलसाता है।
किसी को पुलकित करता है,
तो किसी को कुंठित करता है।

लेकिन इतना निश्चित है
कि वह सबके मन को भाता है,
क्योंकि चाँद तो ठहरा परम उदार,
सबके प्रति समान है उसका व्यवहार।
हमें वैसा ही लगता है,
जैसा हमारा भाव होता है।
चाँद तो जैसे सबके अंतर्मन में ही होता है,
पर बहुत कम लोगों को इसका भान  होता है।

इसलिए करवा चौथ के दिन,
दिन भर की प्रतीक्षा के बाद,
जब दर्शन के लिए चाँद को ढूँढ़ा गया,
तो उसने मेरी ओर इशारा कर दिया।

फिर तो जैसे
मैं स्वयं चाँद बन गया।
सात जन्मों का साथ जब माँगा गया,
तो मैंने भी छलनी के पीछे से
अपना चेहरा दिखा दिया।

और चाँद की ओर देखे बिना ही,  
चाँद से कह दिया— 
"जैसे तुम हो मुझमें,
वैसे ही मैं हूँ तुममें।"

यही है चाँद की महानता,
प्रेम के अमृत की वर्षा
और अमृत के प्रेम की विशालता।

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      — शिव मिश्रा

         मूल रचना:  २९अक्टूबर 2026  



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