एक कंधे की चाहत
किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।
बहुत तन्हा सफ़र है ये, बहुत ख़ामोश हैं राहें,
किसी हमदम की बाँहों में ही खोना चाहता है दिल।
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल। (1)
ये माना ख़ुद में जी लेना भी इक अच्छी कहानी है,
मगर हर दर्द की अपनी अलग इक ज़ुबानी है।
जो आँसू आँख से निकले, कहाँ ख़ुद से छुपेंगे वो,
उन्हें सुनने को आख़िर एक सच्ची निगहबानी है।
इसी ख़ातिर तो रिश्तों का सफ़र होना ज़रूरी है,
किसी के साथ हँस लेना, कभी रोना ज़रूरी है।
किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल... (2)
रिश्ते तो मिट्टी में छुपे बीजों की ख़ुशबू हैं,
कभी बरगद की छाया हैं, कभी मधुवन की खुशबू हैं।
न जाने कौन अपना है, न जाने कौन बेगाना,
मगर इस भीड़ में सबको किसी अपने की जुस्तजू है।
भटकते हैं सभी लेकर कोई मासूम सी हसरत,
किसी के दिल में घर करने, किसी को घर बनाने की।
किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल... (3)
क्यों हर इक शाम ढले,
दिल किसी को पुकारे...
क्यों हर इक दर्द में,
नाम कोई उभारे...
क्यों ये तन्हा सा मन,
ढूँढे इक हमसफ़र...
क्यों ये कंधों की चाहत,
रहे उम्र भर... (4)
जो पौधा आज आँगन में किसी अपने ने रोपा था,
वही कल शाख बनकर दूर अम्बर तक पहुँचता है।
मगर जड़ों की मोहब्बत भूल पाता है कहाँ कोई,
जहाँ से जन्म मिलता है, वहीं दिल लौट आता है।
यही दस्तूर दुनिया का, यही सदियों पुराना है,
मिलन की धूप के पीछे जुदाई का ज़माना है।
किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल। (5)
किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।
बहुत तन्हा सफ़र है ये, बहुत ख़ामोश हैं राहें,
किसी अपने की ख़ामोशी भी सुनना चाहता है दिल।
किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल...
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...
इसी ख़ातिर तो रिश्तों का सफ़र होना ज़रूरी है,
किसी के साथ हँस लेना, कभी रोना ज़रूरी है। (6)
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किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...
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