Thursday, June 18, 2026

"नहीं होते"

 

ग़ज़ल

"नहीं होते"

रिश्ते प्यार के और रास्ते पहाड़ के,
यारों, कभी भी आसान नहीं होते।

कभी आँधी, कभी तूफ़ान, कभी धूप, कभी छाँव,
सफ़र में रोज़ साफ़ आसमान नहीं होते।

ज़रा-सी बात पर दिल में उमड़ आते हैं सैलाब,
मगर हर दर्द के आँखों में निशान नहीं होते।

प्यार इबादत है, सौदा नहीं दुनिया वालों,
मोहब्बतों के भला कोई दाम नहीं होते।

वफ़ा के रास्ते चलते हैं दिल के सहारे,
इन सफ़रों के कहीं नक्शे-निशान नहीं होते।

भावनाओं की भी बैलेंस शीट बनाते हैं लोग,
मगर रिश्तों में कभी लाभ-हानि नहीं होते।

कौन किसको यहाँ कितना समझ सका है आख़िर,
दिलों के राज़ यूँ ही सब पर अयाँ नहीं होते।

जो दिख रहा है वही सच हो, ज़रूरी तो नहीं,
हर आईने के चेहरे भी ज़ुबान नहीं होते।

उम्र भर साथ चलें फिर भी अजनबी रहें लोग,
सिर्फ़ मिलने से सभी अपने समान नहीं होते।

दिलों की चोट का अंदाज़ अलग होता है,
हर ज़ख़्म के जिस्म पर निशान नहीं होते।

दिल बहुत बोझिल है फिर भी यही ग़नीमत है,
पत्थरों के शहरों में सब इंसान नहीं होते।

मक़ता

'शिव' ये रिश्ते भी पहाड़ों की तरह होते हैं,
दूर से जितने सरल दिखें, उतने आसान नहीं होते।

~~~~~~~शिव प्रकाश मिश्रा ~~~~~~~~~~~~

"लेकिन तुम नहीं हो"

 

ग़ज़ल

"लेकिन तुम नहीं हो"

वही हवाएँ हैं लेकिन तुम नहीं हो,
वही फ़िज़ाएँ हैं लेकिन तुम नहीं हो।

ये सर्द रात कहती है बार-बार मुझसे,
सभी तो हैं यहाँ, लेकिन तुम नहीं हो।

कोहरे में ढूँढ़ता हूँ आज भी मैं एक चेहरा,
लगता है पास हो, लेकिन तुम नहीं हो।

वही पहाड़, वही रास्ते, वही सुबह की धूप,
सब कुछ तो है यहाँ, लेकिन तुम नहीं हो।

जहाँ कभी तुम्हारी हँसी गूँजती थी शाम-ओ-सहर,
वहाँ अब सन्नाटा है, लेकिन तुम नहीं हो।

हाथों में हाथ लेकर जो देखे थे ख़्वाब हमने,
वो ख़्वाब तो ज़िंदा हैं, लेकिन तुम नहीं हो।

हर एक मोड़ पर तेरी ही याद ठहर जाती है,
सफ़र तो चल रहा है, लेकिन तुम नहीं हो।

ये सूनी वादियाँ तेरा नाम पुकारती हैं,
हवाओं में सदाएँ हैं, लेकिन तुम नहीं हो।

किसी दरख़्त की ओट में, किसी धुँधले से मंज़र में,
लगता है मुस्कुराओगे, लेकिन तुम नहीं हो।

मैं जानता हूँ कड़वा सच, मैं मानता हूँ इसको,
तुम अब कहीं नहीं हो, लेकिन तुम नहीं हो।

ये दिल भी क्या अजब है, यक़ीन फिर भी नहीं करता,
सामने सच खड़ा है, लेकिन तुम नहीं हो।

यादों की धीमी आँच पर अब भी सुलगता हूँ,
मेरे साथ इश्क़ है, लेकिन तुम नहीं हो।

न जाने वक़्त ने क्यों ऐसी करवटें बदलीं,
वही मैं आज भी हूँ, लेकिन तुम नहीं हो।

'शिव' आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है चुपचाप,
जहाँ बिछड़े थे हम, लेकिन तुम नहीं हो।

"कब बच्चे बड़े हो गए"

 

        ग़ज़ल

"कब बच्चे बड़े हो गए"


सुबह की धूप में कितने सुनहरे सिलसिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

जो उँगली थामकर मेरी कभी चलना सीखे,
न जाने किस दिशा में आज वो आगे चले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

उन्हीं की हँसी से रोशन था मेरा आँगन,
उन्हीं की धुन में दिन बीते, उन्हीं में शाम ढले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

जो अपने ख़्वाब पूरे करने में हरदम लगे,
हम अपने सारे अरमाँ उनके संग ही पले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

न धूपों का था डर कोई, न बारिशों का ख़ौफ़,
मोहब्बतों के परिंदे थे, मोहब्बतों में खिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

वही घोंसला है, शाखें हैं, वही पुराना चमन,
मगर वो नन्हे परिंदे न फिर कभी आ मिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

मैं आज भी कभी खिड़की से झाँक लेता हूँ,
कई बरस हैं मगर दिल के ज़ख़्म कहाँ सिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

वो प्रौढ़-सा जोड़ा अब भी वहीं ठहरा है,
निगाह पूछती है किसलिए ये फ़ासले मिले,
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

कहा उन्होंने — "उड़ानों का यही दस्तूर है,
जो पर मिले तो परिंदे भी कहाँ घर में रहे",
पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

समय की रेत को मुट्ठी में कौन बाँध सका,

शिव' आज भी उसी घोंसले के पास खड़ा,

जहाँ कभी हज़ारों चहकते हुए पल मिले,

पता ही नहीं चला, कब बच्चे बड़े हो गए।

~~~~~~~~~शिव प्रकाश मिश्रा ~~~~~~~~

भीगा सा काजल..

 

विस्मित  मुस्कान हो,
    लाल आसमान हो,
        पलकें  उठें  झुकें,
            लब थर-थराएँ रुकें ,
                पास तुम बैठी रहो,
                    लहराती आंचल. II1II

गुल मोहर खिले कहीं
    दो पल मिलें कहीं
        और एक साथ गिनें
            हृदय की धडकनें 
                चांदनी ढके रहे
                    छोटा सा बादल.. II2II



तारों की बारात हो, 

    खामोश सी रात हो, 

        सांसें कुछ कहें-सुनें, 

            ख्वाब नए हम बुनें, 

                खोए रहें हम-तुम, 

                    भीगा सा काजल.. II3II


धीमी सी बयार हो, 

    सांसों में प्यार हो, 

        जुगनू चमकें कहीं, 

            हम-तुम खोएं कहीं, 

                मन में उठती रहे, 

                    मीठी सी हलचल.. II4II


भोर का पैगाम हो,

     होंठों पे तेरा नाम हो, 

        अगर जन्मों का साथ हो,

            हाथों में हाथ हो, 

                यूं ही बीतता रहे, 

                    जीवन का हर पल.. II5II

**********शिव प्रकाश मिश्र *************

Wednesday, June 17, 2026

एक कंधे की चाहत

 

एक कंधे की चाहत

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।

बहुत तन्हा सफ़र है ये, बहुत ख़ामोश हैं राहें,
किसी हमदम की बाँहों में ही खोना चाहता है दिल।

किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...

किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।   (1)

  

ये माना ख़ुद में जी लेना भी इक अच्छी कहानी है,
मगर हर दर्द की अपनी अलग इक ज़ुबानी है।

जो आँसू आँख से निकले, कहाँ ख़ुद से छुपेंगे वो,
उन्हें सुनने को आख़िर एक सच्ची निगहबानी है।

इसी ख़ातिर तो रिश्तों का सफ़र होना ज़रूरी है,
किसी के साथ हँस लेना, कभी रोना ज़रूरी है।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...    (2)


रिश्ते तो  मिट्टी में छुपे बीजों की ख़ुशबू हैं,
कभी बरगद की छाया हैं, कभी मधुवन की खुशबू  हैं।

न जाने कौन अपना है, न जाने कौन बेगाना,
मगर इस भीड़ में सबको किसी अपने की जुस्तजू है।

भटकते हैं सभी लेकर कोई मासूम सी हसरत,
किसी के दिल में घर करने, किसी को घर बनाने की।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...    (3)


क्यों हर इक शाम ढले,
दिल किसी को पुकारे...

क्यों हर इक दर्द में,
नाम कोई उभारे...

क्यों ये तन्हा सा मन,
ढूँढे इक हमसफ़र...

क्यों ये कंधों की चाहत,
रहे उम्र भर...                                                (4)


जो पौधा आज आँगन में किसी अपने ने रोपा था,
वही कल शाख बनकर दूर अम्बर तक पहुँचता है।

मगर जड़ों की मोहब्बत भूल पाता है कहाँ कोई,
जहाँ से जन्म मिलता है, वहीं दिल लौट आता है।

यही दस्तूर दुनिया का, यही सदियों पुराना है,
मिलन की धूप के पीछे जुदाई का ज़माना है।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।             (5)


किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।

बहुत तन्हा सफ़र है ये, बहुत ख़ामोश हैं राहें,
किसी अपने की ख़ामोशी भी सुनना चाहता है दिल।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल...
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...   

इसी ख़ातिर तो रिश्तों का सफ़र होना ज़रूरी है,
किसी के साथ हँस लेना, कभी रोना ज़रूरी है।               (6)

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किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...  

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Monday, June 15, 2026

तेरे संग मधुर संगीत

 

तेरे संग मधुर संगीत

तेरी आँखों में जो सपने हैं, 

मेरी आँखों में वही प्रीत, 

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत। 

ओ साथी मेरे, ओ हमदम मेरे, 

दिल की धड़कन बन जाओ, 

इस हरियाली की छाँव तले, 

मेरा जीवन महकाओ।।



फूलों की खुशबू कहती है, 

तुम पास मेरे चले आओ, 

पत्तों की सरसर धुन बनकर, 

मेरे मन में बस जाओ। 

कोयल भी मीठे सुर में गाए,

 लेकर अपनी मधुर प्रीत

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत।।


नदिया की बहती लहरों में, 

तेरा ही नाम सुनाई दे, 

सावन की भीगी बूँदों में, 

तेरी मुस्कान दिखाई दे। 

बुलबुल गाए, पवन सुनाए, 

प्रेम भरे ये पावन गीत

तेरे संग हर पल लगता है,

 जैसे हो मधुर संगीत।।


सूरज की पहली किरणों में, 

तेरा चेहरा खिल जाता है, 

चाँदनी रात की बाहों में, 

मेरा मन खो जाता है। 

संग तुम्हारे हर मौसम में, 

महके जीवन का हर गीत, 

तेरे संग हर पल लगता है,

 जैसे हो मधुर संगीत।।


रुक जाएँ ये घड़ियाँ सारी, 

थम जाए यह संसार, 

बस मीठी-मीठी बातें हों, 

और आँखों में हो प्यार। 

हाथों में हाथ रहे जब तक, 

मन में जागे प्रेम-प्रीत, 

तेरे संग हर पल लगता है,

 जैसे हो मधुर संगीत।।


तेरी आँखों में जो सपने हैं, 

मेरी आँखों में वही प्रीत, 

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत... 

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत...

~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~

क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?

  एक कंधे की चाहत 

~ शिव प्रकाश मिश्रा


क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है? 

क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है? 

भटकते हैं सब एक कंधे की चाहत में यहाँ, 

पर अपना कंधा खाली रखने की आदत को न खोया है... 

क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?


 क्यों कोई नहीं चाहता सुख-दुःख स्वयं में समेटना, 

गुमनामियों की चादरों में उम्र अपनी लपेटना। 

रिश्ते न जाने कैसे अंकुरित होकर पनपते हैं, 

समझें न हम इनको मगर, ये फिर भी अच्छे लगते हैं। 

क्या इसीलिए इन रिश्तों का ये ताना-बाना पिरोया है? 

क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है?


एक बीज जैसे थे हम जिसमें सब समाया था, 

जड़, तने और पत्तों ने मिलके एक घर बनाया था। 

बढ़ना मगर नियति थी पौधे की, सो दूर हो गए, 

मंजिल की चाहत में सभी अपने वतन से खो गए। 

जो साथ थे कल तक, उन्हें वक़्त ने ऐसा बिछोया है, 

क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?


इतिहास का ये चक्र बार-बार क्यों दोहराता है? 

जो है नहीं वजूद में, वो क्यों यहाँ सताता है? 

शिव! ढूँढते हैं हमसफ़र पर खुद अकेले रह गए, 

जज्बात के दरिया में सब खामोश होकर बह गए। 

इस खालीपन के बीज को हर शख्स ने यहाँ बोया है...

 क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है?

~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~