अधूरे मन का बोझ
— शिव मिश्रा
बहुत कुछ है इस दुनिया में—
देखने को,
सुनने को,
पढ़ने को,
और करने को।
लेकिन हम—
भागते रहे,
हाँफते रहे,
दिन गिनते रहे,
और व्यस्त रहे।
खाने की चिंता,
पीने की चिंता,
रहने को घर,
ओढ़ने को वस्त्र,
बिछाने को बिस्तर।
बस इसी में उम्र खपती रही—
व्यवस्था बनाते,
अपनी जड़ें जमाते,
भविष्य सँवारते रहे।
यह सोचकर—
जब सब सँवर जाएगा,
जब सारी उलझनें सुलझ जाएँगी,
तब बहुत समय होगा अपने लिए।
तब करेंगे वह सब,
जो मन में रह गया;
फिर से छुएँगे वे सपने,
जिनसे दिल का नाता रहा।
लेकिन कभी यह न सोचा—
समय लौटकर आता नहीं,
बीता हुआ कल फिर हाथ आता नहीं।
बचपन को जवानी में,
जवानी को बुढ़ापे में,
फिर से जिया नहीं जा सकता;
बीते हुए मौसम को
शाखों पर लौटाया नहीं जा सकता।
अब अपने ही अधूरे मन का
यह बोझ कैसे सँभालूँ?
जो स्वयं ही जी न सका,
उसका हिसाब औरों से कैसे माँगूँ?
हर काम का समय है,
हर पल का अपना मोल;
वक्त निकल जाए तो
खुलते नहीं बीते कल के बोल।
जो करना था, रह गया—
वह फिर कहाँ से आएगा?
जो जीवन जी न सके,
वह मन में याद बनकर रह जाएगा।
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- शिव मिश्रा
मूल रचना: जनवरी 2020, मुंबई
Wednesday, October 28, 2026
अपने अधूरे मन का बोझ
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