डूबते को तिनके का सहारा
— शिव प्रकाश मिश्रा
जुलाई १९८०
"डूबते को तिनके का सहारा",
कितना सहज है, यह कहना तुम्हारा!
पर मैंने तो देखा है लोगों को—
उसी तिनके में उलझ कर,
असहाय डूबते हुए।
तुम यह क्यों नहीं कहते?
कि यह बात है, सिर्फ़ कहने के लिए!
अभी कुछ देर पहले,
मैं कितनी ऊँचाई पर उड़ रहा था।
मैंने ऊँचाई तो बहुत देखी है,
अब गहराई देखना चाहता हूँ!
'बच नहीं सकता यहाँ से गिरकर इस दरिया में'—
आसमान से गिरते हुए मैं यही सोच रहा था,
और यह भी... कि क्या कोई तिनका बचाने आएगा मुझे?
क्योंकि तैरना मुझे आता नहीं,
पर उड़ना? वह तो अनिवार्य शर्त है मेरे जीवन की।
आखिर, बिना उड़े भी कोई पक्षी कहलाएगा क्या?
और कोई पक्षी, तैर कर दरिया पार करेगा क्या?
मैं पानी में गिरा हूँ, ये संयोग नहीं, प्रयोग है मेरे लिए—
किसी तिनके का!
वरना... अपनी मर्ज़ी से यहाँ,
डूबना किसे अच्छा लगता है?
~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~