रिश्ता… टूट रहा …!
गीतकार : शिव प्रकाश मिश्रा
मन भटकता है रह-रहकर, जाने कहाँ, जाने कहाँ,
यादों की उस नदी किनारे, खींच रहा बचपन वहाँ।
अटूट रिश्ता था जो उससे, आज टूटता-सा लगता है,
मेरे गाँव की प्यारी नदी का, दिल रूठता-सा लगता है॥1
शाम-सवेरे दौड़ा करते, जिसके तट पर हम मतवाले,
हँसी-खुशी के रंग बिखरते, दिन थे कितने भोले-भाले।
प्यास लगे तो जल पी लेते, चुल्लू भर या डुबकी खाकर,
कभी शेर बन दहाड़ लगाते, कभी मछली बन इतराकर।
छप-छप करते उथले जल में, बालू पर लिखते अफ़साने,
आज भी मन में गूँज रहे हैं, बचपन वाले वे तराने॥2
रेती पर हम महल बनाते, कागज़ की नावें तैराते,
चींटी-चींटों को बैठाकर, नदी-सैर हम करवाते।
सीपी, शंख, रंगीन पत्थर, ढूँढ़-ढूँढ़ कर घर ले आते,
मिट्टी की उन छोटी खुशियों को, दिल में अपने सदा सजाते।
कुछ सिक्के अब भी हैं पास, यादों की सौगात बनाकर,
नदी और मेरे बचपन का, रिश्ता रखते हैं सँजोकर॥3
जब-जब ऊंची बाढ़ें आतीं, लगता सागर घर आया है,
लहरों के चंचल रेले ने, मन में नव-उमंग जगाया है।
सरकंडों की छोटी चौकी, हम बाढ़ रोकने को गाड़ें,
बच्चों वाली ज़िद से अपनी, खुशियों के हम दीप जलाएँ।
पुल न था फिर भी गाँव हमारा, कभी किसी से कम न था,
निकसन काका की वह नैया, सबकी उम्मीदों का दम था॥4
बरसों बाद आज लौटा हूँ, उसी पुराने तट की ओर,
ढूँढ़ रहा हूँ बीते कल को, थामे यादों की मीठी डोर।
पर जो देखा, मन भर आया, एक गहरा दुख दे गया,
जीवन देने वाली नदी को, समय यह क्या से क्या कर गया!
मलिन हुई, कमजोर हुई है, सूखी-सूखी साँसें हैं,
टूटने लगीं अब इस तट पर, जीवन की सब आशाएँ हैं॥5
धीरे-धीरे मुझसे कहती, मेरी बचपन वाली साथी—
"थक गई हूँ, सूख रही हूँ, सुन लो मेरी व्यथा ज़रा-सी।
मुझको फिर से जीवन दे दो, मुझको फिर से बहने दो,
अपने बच्चों के सपनों में, मुझको फिर से रहने दो।"
अटूट रिश्ता था जो मुझसे, मत टूटने दो उसे पुकारो,
नदियाँ बचेंगी तो बचेगा, यह संसार हमारा, यारों॥6
मन भटकता है रह-रहकर, जाने कहाँ, जाने कहाँ,
यादों की उस नदी किनारे, खींच रहा बचपन वहाँ।
अटूट रिश्ता था जो उससे, मत टूटने दो अब यारों,
मेरे गाँव की प्यारी नदी को, फिर जीवन दो, ऐ यारों…
फिर जीवन दो, ऐ यारों… फिर जीवन दो, ऐ यारों…॥7
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Monday, June 22, 2026
रिश्ता… टूट रहा …!
"जो समझे तो जीवन हूँ"
"जो समझे तो जीवन हूँ"
— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति : जुलाई १९८०)
छोड़ दो अब साथ मेरा, बुझता एक चिराग़ हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।
यही दुर्भाग्य है मेरा, काम न आ सका मैं तेरे,
दुःख और दर्द के सिवा, क्या था भला पास मेरे।
आज चाहो तो मुझे अंतिम मधुर मुस्कान दे दो,
या जो किसी को न दिया, वह अपमान दे दो।
अँधेरी वादियों में भटकता विरह का राग हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (१)
आत्मा पर बोझ बनकर, चाहकर भी न बोल पाया,
अंतस के घाव रिसते रहे, कोई भेद खोल न पाया।
आज चाहे इस तपस्या का यहीं अवसान कर दो,
कहूँगा कुछ नहीं, चाहे मुझे बदनाम कर दो।
जो बुझ न सके कभी, ऐसी सुलगती आग हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (२)
कभी था महफ़िलों की शान, आज तन्हाई का साया हूँ,
जिन्हें अपना समझा था कभी, उनसे ही धोखा खाया हूँ।
मेरी ख़ामोशी को दुनिया ने 'हार' का नाम दिया,
मेरी सादगी का ज़माने ने कैसा सिला दिया।
इस मतलबी ज़माने में, बस एक भूला ख़्वाब हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (३)
ठोकरों ने ही सिखाया, राह पर कैसे चला जाए,
टूटकर बिखरे बिना भी, दर्द को कैसे जिया जाए।
दुनिया ने जिन्हें दाग़ कहा, वही मेरी पहचान बने,
वक़्त की धूप में तपकर, जीवन के वरदान बने।
घावों से निखरा हुआ, अनुभव का अनुराग हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (४)
जो कल तक ज़ख़्म थे सीने में, आज हैं मेरी जागीर,
अपने ही हाथों से बदली मैंने अपनी तक़दीर।
संघर्षों की भट्टी में तपकर, ख़ुद को ऐसा ढाला है,
अपनी डूबती हुई कश्ती को, ख़ुद ही आज सँभाला है।
समय की हर चोट से उपजा, जीवन का विश्वास हूँ मैं,
नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (५)
अब न शिकवा है किसी से, न किसी से तंग हूँ मैं,
उम्र की इस साँझ में, बस ख़ुद के ही संग हूँ मैं।
बुझता चिराग़ नहीं अब, अनुभव का प्रकाश हूँ मैं,
लंबी पीड़ा से गुज़रकर, जगा नया विश्वास हूँ मैं।
जो समझ सके तो जीवन हूँ, न समझे तो दाग़ हूँ मैं,
अपने ही सच का साक्षी, और अपना अनुराग हूँ मैं।
अब नहीं खलता मुझको यह बदनुमा दाग़ होना,
इन्हीं दाग़ों की रोशनी से, चमका अपना भाग्य हूँ मैं।
~~~~शिव मिश्रा ~~~~
Sunday, June 21, 2026
कौन हूँ मैं?
कौन हूँ मैं?
— शिव प्रकाश मिश्रा
कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा?
न पूछो अभी तक क्या करता रहा!
एक चाहत लिए दाँव रखता रहा,
उनकी ही शह पे मैं मात खाता रहा।
हारकर मैंने खोया नहीं हौसला,
जीत या हार होना नहीं फ़ैसला।
आज अपना कोई बन गया अजनबी,
रोज़ जिसको हृदय में बिठाता रहा,
न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (1)
एक पागल पथिक-सा फिरूँ दर-बदर,
कितनी राहें चलीं, कुछ नहीं है ख़बर।
ताक पर आस-सपने सजाता रहा,
नीर पलकों में अपनी छुपाता रहा।
आज ऐसी कहानी नहीं कह सका,
शब्द जिसके लिए ढूँढ़ता फिर रहा,
न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (2)
धूप ने हर कदम पर जलाया मुझे,
छाँव ने भी कहाँ फिर बचाया मुझे।
वक्त की आँधियों में बिखरता रहा,
फिर भी उम्मीद लेकर सँवरता रहा।
जो मिला राह में, साथ चलता रहा,
जो गया छोड़कर, याद बनता रहा,
न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (3)
एक दीपक अँधेरों में जलता रहा,
अपनी लौ से स्वयं को ही छलता रहा।
रात भर ख़्वाब की नाव खेता रहा,
भोर होते ही साहिल बदलता रहा।
दर्द को गीत की शक्ल देता रहा,
मौन में भी किसी से मैं कहता रहा,
न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (4)
ज़िंदगी ने कई रंग दिखलाए हैं,
कुछ हँसी के, कई अश्रु बन आए हैं।
जो मिले फूल, काँटों के साथ ही मिले,
जो मिले लोग, अक्सर बदलते मिले।
फिर भी रिश्तों की माला पिरोता रहा,
टूटकर भी सदा मुस्कुराता रहा,
न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (5)
आईने से कभी जब नज़र मिल गई,
एक अनजान-सी फिर डगर मिल गई।
खोजता था जिसे मैं ज़माने भर,
वो मेरे ही भीतर आकर मिल गई।
खुद को पाने की कोशिश में उम्र भर,
अपने ही प्रश्न का उत्तर बनता रहा,
न पूछो अभी तक क्या करता रहा! (6)
कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा,
यह सवाल उम्र भर मुझसे उलझता रहा।
ढूँढ़ता था जिसे मैं जहाँ-तहाँ,
वह मेरे ही भीतर ठहरता रहा।
अब न मंज़िल की चाहत, न रस्तों का ग़म,
एक मुसाफ़िर था, बस यूँ ही चलता रहा।
जो लिखा था मुकद्दर ने, सहता रहा,
जो न लिखा था, उसको भी कहता रहा।
अब न पूछो कि क्या खोया, क्या पा लिया,
ज़हर पीकर भी जीवन को गा लिया।
कौन हूँ मैं, कहाँ से गुज़रता रहा?
न पूछो अभी तक क्या करता रहा!
न पूछो अभी तक क्या करता रहा...॥ (7)
~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~
"अपनी छाया से भी अक्सर डरते हैं लोग"
अपनी छाया से डरते हैं लोग
— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति: जून १९८०)
ख़ुद मरने की मन्नत मांगते हैं लोग,
हँसते-हँसते भी रोते-से रहते हैं लोग।
सूना घर है कहीं, कोई रहने वाला नहीं,
एक छत के लिए क्यों तरसते हैं लोग।
कोई अपना नहीं, कोई सपना नहीं,
कितने अपने भी सपने-से लगते हैं लोग।
फ़ासले हैं बहुत, फिर भी लगते क़रीब,
कितने अपनों से दूरी बनाते हैं लोग।
क्यों ज़नाज़ा उठा? जानते हैं सभी,
फिर भी मरने से कितना डरते हैं लोग।
ऐ ज़माने ! अब भला क्या भरोसा करें,
अपनी छाया से भी अक्सर डरते हैं लोग।
भीड़ में हर तरफ़ आदमी ही मिलें,
फिर भी तन्हाइयों में सिमटते हैं लोग।
हाथ मिलते हैं, दिल तक पहुँचते नहीं,
बस मुखौटों में रिश्ते निभाते हैं लोग।
जिसको सच मानकर उम्र भर पूजते,
वक़्त आने पर उसको भुलाते हैं लोग।
अपने ही आइनों से नज़रेँ चुराकर,
ख़ुद से मिलने से भी कतराते हैं लोग।
प्यास दरिया की है, और दरिया उदास,
फिर भी सागर की चाहत में बहते हैं लोग।
धूप सिर पर खड़ी, छाँव पास ही मगर,
रेत के घर बनाकर बहलते हैं लोग।
एक पल की ख़ुशी के लिए रात-दिन,
सारी उम्र का चैन गँवाते हैं लोग।
जिसको पाकर भी हासिल नहीं कुछ हुआ,
उसके पीछे ही जीवन बिताते हैं लोग।
नाम, दौलत, शोहरत की ऊँची उड़ान,
इन हवाओं में अक्सर उलझते हैं लोग।
मंज़िलों से अधिक रास्तों की थकन,
अपने कंधों पर ढोते ही रहते हैं लोग।
वक़्त की धूल चेहरों पर जमती रही,
फिर भी चेहरे नए-नए धरते हैं लोग।
दिल की बस्ती उजड़ती रहे तो रहे,
झूठ की रौशनी में सँवरते हैं लोग।
रात गहरी हो जब, डर भी बढ़ता है तब,
अपने साये को दुश्मन समझते हैं लोग।
एक आवाज़ भीतर से आती तो है,
उसको सुनने से लेकिन बचते हैं लोग।
सच का दर्पण दिखाए जो तस्वीर को,
उस हक़ीक़त से ही आँखें चुराते हैं लोग।
ख़ुद को पहचान लें तो बदल जाएँ सब,
इसलिए ख़ुद से ही दूर रहते हैं लोग।
देखकर दूसरों की बुझी सी शमा,
अपना दामन बचाकर निकलते हैं लोग।
दर्द बाँटें तो शायद हल्का हो सफ़र,
दर्द को भी मगर राज़ रखते हैं लोग।
आँधियाँ जब कभी घर गिराती हैं यूँ,
तिनके-तिनके से फिर घर बनाते हैं लोग।
टूट जाते हैं, बिखरते हैं सौ बार पर,
जीने की ज़िद नहीं छोड़ते हैं लोग।
कौन किसका यहाँ, कौन किसके लिए,
ये पहेली सदा ही बुझाते हैं लोग।
ज़िंदगी चार दिन की सराय ही सही,
फिर भी सदियों का सामान रखते हैं लोग।
कल जिन्हें भूल जाना है दुनिया को भी,
उन निशानों पर अभिमान करते हैं लोग।
ऐ ज़माने! अब शिव क्या भरोसा करे,
रंग मौसम के पल-पल बदलते हैं लोग।
ख़ुद मरने की मन्नत मनाते हैं लोग,
हँसते-हँसते भी रोते-से रहते हैं लोग।
और सबसे बड़ा सच यही है शायद—
अपनी छाया से भी अक्सर डरते हैं लोग...॥
~~~~शिव प्रकाश मिश्रा ~~~~~~