Wednesday, June 17, 2026

एक कंधे की चाहत

 

एक कंधे की चाहत

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।

बहुत तन्हा सफ़र है ये, बहुत ख़ामोश हैं राहें,
किसी हमदम की बाँहों में ही खोना चाहता है दिल।

किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...

किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।   (1)

  

ये माना ख़ुद में जी लेना भी इक अच्छी कहानी है,
मगर हर दर्द की अपनी अलग इक ज़ुबानी है।

जो आँसू आँख से निकले, कहाँ ख़ुद से छुपेंगे वो,
उन्हें सुनने को आख़िर एक सच्ची निगहबानी है।

इसी ख़ातिर तो रिश्तों का सफ़र होना ज़रूरी है,
किसी के साथ हँस लेना, कभी रोना ज़रूरी है।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...    (2)


रिश्ते तो  मिट्टी में छुपे बीजों की ख़ुशबू हैं,
कभी बरगद की छाया हैं, कभी मधुवन की खुशबू  हैं।

न जाने कौन अपना है, न जाने कौन बेगाना,
मगर इस भीड़ में सबको किसी अपने की जुस्तजू है।

भटकते हैं सभी लेकर कोई मासूम सी हसरत,
किसी के दिल में घर करने, किसी को घर बनाने की।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...    (3)


क्यों हर इक शाम ढले,
दिल किसी को पुकारे...

क्यों हर इक दर्द में,
नाम कोई उभारे...

क्यों ये तन्हा सा मन,
ढूँढे इक हमसफ़र...

क्यों ये कंधों की चाहत,
रहे उम्र भर...                                                (4)


जो पौधा आज आँगन में किसी अपने ने रोपा था,
वही कल शाख बनकर दूर अम्बर तक पहुँचता है।

मगर जड़ों की मोहब्बत भूल पाता है कहाँ कोई,
जहाँ से जन्म मिलता है, वहीं दिल लौट आता है।

यही दस्तूर दुनिया का, यही सदियों पुराना है,
मिलन की धूप के पीछे जुदाई का ज़माना है।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।             (5)


किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल।

बहुत तन्हा सफ़र है ये, बहुत ख़ामोश हैं राहें,
किसी अपने की ख़ामोशी भी सुनना चाहता है दिल।

किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल...
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...   

इसी ख़ातिर तो रिश्तों का सफ़र होना ज़रूरी है,
किसी के साथ हँस लेना, कभी रोना ज़रूरी है।               (6)

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किसी की गोद में सर रख के सोना चाहता है दिल,
किसी के कंधे पे जी भर के रोना चाहता है दिल...  

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Monday, June 15, 2026

तेरे संग मधुर संगीत

 

तेरे संग मधुर संगीत

तेरी आँखों में जो सपने हैं, 

मेरी आँखों में वही प्रीत, 

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत। 

ओ साथी मेरे, ओ हमदम मेरे, 

दिल की धड़कन बन जाओ, 

इस हरियाली की छाँव तले, 

मेरा जीवन महकाओ।।



फूलों की खुशबू कहती है, 

तुम पास मेरे चले आओ, 

पत्तों की सरसर धुन बनकर, 

मेरे मन में बस जाओ। 

कोयल भी मीठे सुर में गाए,

 लेकर अपनी मधुर प्रीत

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत।।


नदिया की बहती लहरों में, 

तेरा ही नाम सुनाई दे, 

सावन की भीगी बूँदों में, 

तेरी मुस्कान दिखाई दे। 

बुलबुल गाए, पवन सुनाए, 

प्रेम भरे ये पावन गीत

तेरे संग हर पल लगता है,

 जैसे हो मधुर संगीत।।


सूरज की पहली किरणों में, 

तेरा चेहरा खिल जाता है, 

चाँदनी रात की बाहों में, 

मेरा मन खो जाता है। 

संग तुम्हारे हर मौसम में, 

महके जीवन का हर गीत, 

तेरे संग हर पल लगता है,

 जैसे हो मधुर संगीत।।


रुक जाएँ ये घड़ियाँ सारी, 

थम जाए यह संसार, 

बस मीठी-मीठी बातें हों, 

और आँखों में हो प्यार। 

हाथों में हाथ रहे जब तक, 

मन में जागे प्रेम-प्रीत, 

तेरे संग हर पल लगता है,

 जैसे हो मधुर संगीत।।


तेरी आँखों में जो सपने हैं, 

मेरी आँखों में वही प्रीत, 

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत... 

तेरे संग हर पल लगता है, 

जैसे हो मधुर संगीत...

~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~

क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?

  एक कंधे की चाहत 

~ शिव प्रकाश मिश्रा


क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है? 

क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है? 

भटकते हैं सब एक कंधे की चाहत में यहाँ, 

पर अपना कंधा खाली रखने की आदत को न खोया है... 

क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?


 क्यों कोई नहीं चाहता सुख-दुःख स्वयं में समेटना, 

गुमनामियों की चादरों में उम्र अपनी लपेटना। 

रिश्ते न जाने कैसे अंकुरित होकर पनपते हैं, 

समझें न हम इनको मगर, ये फिर भी अच्छे लगते हैं। 

क्या इसीलिए इन रिश्तों का ये ताना-बाना पिरोया है? 

क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है?


एक बीज जैसे थे हम जिसमें सब समाया था, 

जड़, तने और पत्तों ने मिलके एक घर बनाया था। 

बढ़ना मगर नियति थी पौधे की, सो दूर हो गए, 

मंजिल की चाहत में सभी अपने वतन से खो गए। 

जो साथ थे कल तक, उन्हें वक़्त ने ऐसा बिछोया है, 

क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?


इतिहास का ये चक्र बार-बार क्यों दोहराता है? 

जो है नहीं वजूद में, वो क्यों यहाँ सताता है? 

शिव! ढूँढते हैं हमसफ़र पर खुद अकेले रह गए, 

जज्बात के दरिया में सब खामोश होकर बह गए। 

इस खालीपन के बीज को हर शख्स ने यहाँ बोया है...

 क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है?

~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~

हर दिल को एक कंधे की चाहत है,

 भटकते हैं सभी, हर दिल को एक कंधे की चाहत है, 

मगर अपना ही कंधा छोड़ देना एक आदत है।

समेटे क्यों कोई सुख-दुःख अकेला अपने ही भीतर, 

ज़माने से छुपाना खुद को कैसी ये बगावत है?

जो अंकुर की तरह फूटे, बढ़े और दूर हो जाएँ,

 ये रिश्तों का बिखराव तो पौधों की सियासत है।

जो सदियों से यहाँ मौजूद ही नहीं वजूद में अपने, 

उसी इतिहास को दोहराना कैसी ये रिवायत है?

चले हैं 'शिव' जहाँ में ढूँढने हमदर्द को अपने, 

मगर इस खालीपन में जीना भी तो इक इबादत है।

~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~

  

🌿 सुखद क्षण — मधुर संगीत 🎶

 

🌿 सुखद क्षण — मधुर संगीत 🎶


तेरी आँखों में जो सपने हैं,
मेरी आँखों का भी वही गीत,
तेरे संग हर पल लगता है,
जैसे हो मधुर संगीत।

ओ साथी मेरे, ओ हमदम मेरे,
दिल की धड़कन बन जाओ,
इस हरियाली की छाँव तले,
मेरा जीवन महकाओ।।



फूलों की खुशबू कहती है,
तुम पास मेरे आ जाओ,
पत्तों की सरसर धुन बनकर,
मेरे मन में बस जाओ।

कोयल भी मीठे सुर में गाए,
सुनकर अपनी प्रीत,
तेरे संग हर पल लगता है,
जैसे हो मधुर संगीत।।



नदिया की बहती लहरों में,
तेरा ही नाम सुनाई दे,
सावन की भीगी बूँदों में,
तेरी मुस्कान दिखाई दे।

बुलबुल गाए, पवन सुनाए,
प्रेम भरे मनमीत,
तेरे संग हर पल लगता है,
जैसे हो मधुर संगीत।।



सूरज की पहली किरणों में,
तेरा चेहरा खिल जाता है,
चाँदनी रातों की बाहों में,
मेरा मन खो जाता है।

संग तुम्हारे हर मौसम में,
महके जीवन-गीत,
तेरे संग हर पल लगता है,
जैसे हो मधुर संगीत।।



रुक जाएँ ये घड़ियाँ सारी,
थम जाए यह संसार,
बस तेरी मेरी बातें हों,
और आँखों में प्यार।

हाथों में हाथ रहे जब तक,
धड़कें प्रेम-प्रीत,
तेरे संग हर पल लगता है,
जैसे हो मधुर संगीत।।



तेरी आँखों में जो सपने हैं,
मेरी आँखों का भी वही गीत,
तेरे संग हर पल लगता है,
जैसे हो मधुर संगीत...

तेरे संग हर पल लगता है,
जैसे हो मधुर संगीत... 🎶🌿❤️

🌿 सांसो का संगीत 🎶

🌿 साँसों का संगीत 🎶


पलकों की छाँव तले बैठें हम,
गाएँ मन के गीत,
संग तुम्हारे खिल उठता है,
सांसों का  संगीत।


फलों की छाँव तले बैठें हम,
गाएँ मन के गीत,
संग तुम्हारे खिल उठता है,
हर सुखद संगीत।।


मंद पवन जब छूकर जाए,
मन में राग जगाए,
कोयल मीठे सुर में गाकर,
प्रेम कथा दोहराए।


पत्तों की सरसर धुन बन जाए,
झूम उठे हर प्रीत,
संग तुम्हारे खिल उठता है,
साँसों का संगीत।।


नीले नभ की चूनर ओढ़े,
सपनों का संसार,
तेरी  मीठी बातें होती,
जैसे पहला प्यार।

पल-पल बन जाए याद सुहानी,
हर धड़कन नव गीत,
संग तुम्हारे खिल उठता है,
साँसों का  संगीत।।


बुलबुल, तोता, कोयल गाएँ,
मिलकर नई बहार,
हँसी तुम्हारी जैसे बिखरे,
फूलों का उपहार।


जीवन की इस मधुर डगर पर,
साथ रहे मनमीत,
संग तुम्हारे खिल उठता है,
सांसों का  संगीत।।


जब तक सूरज, चाँद, सितारे,
जब तक यह जग रीत,
तुम संग हर पल गुनगुनाऊँ,
प्रेम भरा यह गीत।।


पलकों की छाँव तले बैठें हम,
गाएँ मन के गीत,
संग तुम्हारे खिल उठता है,
सांसों  का  संगीत।। 🎶🌿

~~~~~~~~शिव मिश्र ~~~~~~~


Wednesday, May 27, 2026

तिनके का सहारा


                    डूबते को तिनके का सहारा 

                                     — शिव प्रकाश मिश्रा

                                              जुलाई १९८०


"डूबते को तिनके का सहारा", 

कितना सहज है, यह कहना तुम्हारा!

 पर मैंने तो देखा है लोगों को— 

उसी तिनके में उलझ कर, 

असहाय डूबते हुए।

 तुम यह क्यों नहीं कहते?

                   कि यह बात है, सिर्फ़ कहने के लिए!

अभी कुछ देर पहले, 

मैं कितनी ऊँचाई पर उड़ रहा था। 

मैंने ऊँचाई तो बहुत देखी है, 

अब गहराई देखना चाहता हूँ! 

'बच नहीं सकता यहाँ से गिरकर इस दरिया में'— 

आसमान से गिरते हुए मैं यही सोच रहा था, 

और यह भी... कि क्या कोई तिनका बचाने आएगा मुझे?

क्योंकि तैरना मुझे आता नहीं,

 पर उड़ना? वह तो अनिवार्य शर्त है मेरे जीवन की। 

आखिर, बिना उड़े भी कोई पक्षी कहलाएगा क्या? 

और  कोई पक्षी, तैर कर दरिया पार करेगा क्या?

मैं पानी में गिरा हूँ, ये संयोग नहीं, प्रयोग है मेरे लिए—

 किसी तिनके का! 

वरना... अपनी मर्ज़ी से यहाँ, 

डूबना किसे अच्छा लगता है?

~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~