माँ, अगर तुम न होती
माँ, अगर तुम न होती,
तो मैं ही कहाँ होता?
इन साँसों की डोरी में,
कोई नाम कहाँ होता?
जब इस दुनिया में आया,
तुमने ही गले लगाया,
मेरे देखे हर सपने को,
तुमने ही तो सजाया।
तेरी उँगली को थामे ही,
मैंने चलना सीखा है,
तेरी ममता की छाँव में,
हर दर्द मेरा फीका है।
जब रोया मैं रातों में,
लोरी गाकर सुलाया है,
मेरी सूनी दुनिया को,
आँचल से सजाया है।
तेरी गोदी का वो झूला,
हर ख़ुशी से बढ़कर प्यारा है,
भटकूँ जब इस दुनिया में,
तू ही मेरा ध्रुवतारा है।
मेरी हर एक शरारत को,
हँसकर तुमने माफ़ किया,
मेरे जीवन के रस्ते को,
अपने अश्कों से साफ़ किया।
मेरी अंधियारी राहों में,
दीपक सा तुम जलती हो,
जीवन की हर ठोकर पर
ममता बनकर मिलती हो।
भूखा ही रह जाता मैं,
यदि तेरी ममता न मिलती,
सूनी पड़ जाती यह दुनिया
आँचल की छाँव नहीं मिलती।
मेरी पहली भाषा हो तुम,
विश्वास की परिभाषा हो तुम,
मुझमें जो कुछ भी अच्छा है,
उसकी रचनाकार हो तुम ।
हर संकट, हर मुश्किल में
तेरे आशीष बचाते हैं,
मैं जब भी गिर जाता हूँ,
तेरे हौसले उठाते हैं।
मेरी हर मिली सफलता पर
मुझसे ज्यादा तुम खिलती हो,
मेरी हर छोटी पीड़ा में
मुझसे ज्यादा तुम रोती हो।
मेरी समझ, शब्द और स्वर
सब तेरी ही तो थाती हैं,
जो कुछ भी मैं लिख पाता हूँ,
तेरे संस्कारों की बाती हैं।
तेरी रोशनी से राह मिलती है
वरना इस भीड़ में खो जाता मैं कहीं,
हर सांस में तेरा ही अहसास है,
बस तेरे होने से हूँ मैं यहीं।
खुशियाँ सारी इस जग की,
तेरे कदमों में लाकर रख दूँ,
अगर मिले मुझको मौका ,
तो अपनी उम्र भी तुझको दे दूँ।
माँ, तुम केवल रिश्ता नहीं,
मेरे जीवन का आधार हो,
ईश्वर मुझे मिले न मिले,
तुम मेरे लिए अवतार हो।
तू ही मेरी पूजा है माँ,
तू ही मेरा भगवान है,
तेरे ही दम से चलती,
इस बच्चे की जान है।
माँ, अगर तुम न होती,
तो मैं ही कहाँ होता?
भीड़ भरी इस दुनिया में
मेरा नामो-निशाँ न होता।
माँ, अगर तुम न होती,
तो मैं ही कहाँ होता?
इन साँसों की डोरी में,
कोई नाम कहाँ होता?
~~~~~~ शिव मिश्रा ~~~~~~