खुद से एक मुलाकात
— शिव मिश्रा
बहुत कुछ था कहने को,
मगर किसी को सुनने की फुर्सत कहाँ थी,
सबको अपनी-अपनी चिंता थी,
मेरी फिक्र करने की फुर्सत किसे थी।
मैंने भी मुस्कुराकर कह दिया—
“हाँ, सब ठीक चल रहा है,”
पर मेरे भीतर ही भीतर कुछ,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा ढह रहा था।
मैं दूसरों की रातों में,
सुबह का उजाला भरता रहा,
किसी के टूटे हुए सपनों को,
अपने हाथों से जोड़ता रहा।
किसी ने पूछा नहीं,
कि मेरी नींद क्यों कम हो गई,
किसी ने देखा नहीं,
कि आँखों की चमक कहाँ खो गई।
मैं रिश्तों की छत बनकर,
सबको बारिश से बचाता रहा,
और जाने कब मेरे ही भीतर,
एक घर बिना छत का रह गया।
कभी किसी के रूठने पर,
मैंने खुद को मना लिया,
कभी किसी की गलती पर,
मैंने अपना मन समझा लिया।
हर बार यही सोचकर चुप रहा—
“रिश्ता है, जाने दो...”
और धीरे-धीरे मेरी आवाज़ ने,
मुझसे ही कुछ कहना छोड़ दिया।
अब किसी से कोई शिकायत नहीं,
न किसी से कोई सवाल है,
बस इतना-सा अफ़सोस है—
मैं सबके लिए मौजूद रहा,
पर अपने ही लिए बहुत देर से आया हूँ।
अब जो बचा है मेरे भीतर,
उसे भी सँभालना सीख रहा हूँ,
दूसरों के हिस्से की खुशियाँ बाँटते-बाँटते,
अब अपनी खुशी भी पहचान रहा हूँ।
हर किसी का अपना बनने की,
अब कोई ज़िद नहीं रही,
जिसे रहना है, रहे मेरे साथ—
हर दरवाज़े पर खड़े रहने की,
अब आदत नहीं रही।
क्योंकि मैंने जाना है—
अपने आपको खोकर,
कोई रिश्ता बचाया नहीं जाता,
और जो इंसान खुद के भीतर ही नहीं बचा,
वह किसी का अपना कब तक बना रहता?
~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~
हैदराबाद 16 अगस्त 2026