"दुनिया मुट्ठी में"
— शिव मिश्रा
तुम साथ हमारे होती हो,तो बात बड़ी हो जाती है।दुनिया छोटी हो जाती है,मेरी मुट्ठी में आ जाती है। १.
इतना ऊँचा उठ जाता हूँ,बादलों के पार पहुँचता हूँ।तारों को भी छू सकता हूँ,चाँद से बातें कर सकता हूँ। २.
ऊँचे पर्वत शिखरों को भी,मैं प्यार से सहला सकता हूँ।ओस की नन्हीं बूँदों को भी,हाथों में ही ढक सकता हूँ। ३.
सागर कहाँ सहन करता यह,ऊँचा उठने की हठ करता।उठता, गिरता और संभलता,सुख की सीमा नहीं समझता। ४.
रात्रि भले नीरवता लाकर,प्रतिदिन मुझे सुलाती है।ऊषा सिंदूरी थाल सजाकर,नियमित मुझे जगाती है। ५.
मेरे साथ तुम्हारा होना,सावन की फुहार बताती है।फूलों की महक तो हर पल,संदेश तुम्हारा लाती है। ६.
गर्मी, सर्दी और बारिश भी,केवल यह याद दिलाती हैं।तुम यहीं कहीं हो आसपास,मीठा आभास कराती हैं। ७.
साथ तुम्हारा होने से,कितना कुछ बदल जाता है।साधारण सा यह जीवन भी,अत्यंत असाधारण हो जाता है। ८.
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- शिव मिश्रा