Sunday, October 4, 2026

तुम बिन कुछ अच्छा नहीं लगता


एक छोटी-सी बात

शिव प्रकाश मिश्र


बात बहुत ही छोटी थी,

बस इतनी-सी बात थी,

तुम मुझे अच्छे लगते थे,

मन में इतनी बात थी।

पहले तुम  केवल अच्छे लगते थे,

अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

(1)

समझ न पाया आज तलक,

मन क्यों तुममें खो गया,

सोचा बहुत, विचार किया,

यह क्या से क्या हो गया।

हृदय के आगे बुद्धि भला,

अपनी बात कहाँ कह पाती,

तर्क जहाँ थककर रुक जाते,

भावना बहुत आगे बढ़ जाती।

पहले तुम अच्छे लगते थे,

अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

(2)

कब सीमाएँ टूट गईं,

कब मन इतना बढ़ गया,

शांत हृदय के सागर में,

कैसा तूफान उमड़ गया।

विवेक मौन है अब मेरा,

मन किसी की सुनता नहीं,

तुम्हारे सिवा अब कोई

सपनों में भी दिखता नहीं।

पहले तुम अच्छे लगते थे,

अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

 (3)

बाहर की दुनिया में शायद,

कुछ भी न  बदला हो लेकिन ,

भीतर का मौसम बदल गया,

मन पहले जैसा रहा नहीं।

संभव है सब पहले जैसा ही हो 

मुझको  सामान्य नहीं लगता,

पहले तुम  अच्छे लगते थे,

अब तुम बिन कुछ भी  अच्छा नहीं लगता।

~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~

"एक छोटी सी बात - १९८२ से २०२६"

 

"एक छोटी सी बात"

       — शिव मिश्रा

(मूल कृति : मई 1982 का 2026 संस्करण)

 

बात बहुत छोटी थी,

 बस इतनी-सी थी—

कि तुम मुझे अच्छे लगते थे।

न कोई कारण था,

न कोई विशेष बात,

न  इसका कोई स्पष्ट उत्तर था।

बहुत सोचा मैंने—

आखिर क्यों?

पर  कुछ प्रश्न

तर्क से कहाँ सुलझते हैं!

बात बहुत छोटी थी,

बस इतनी-सी बात थी—

कि तुम मुझे अच्छे लगते थे।

न कोई कारण था,

न कोई विशेष बात,

न इसका कोई स्पष्ट उत्तर था।

बहुत सोचा मैंने—

आखिर क्यों?

हर संभव कारण तलाशा,

हर उत्तर को परखा,

फिर भी कुछ समझ नहीं आया।

मन के आगे

तर्क का होता भी क्या भला!

मैंने समझा था—

यह भी एक क्षण होगा,

आएगा...

और चुपचाप गुजर जाएगा। 

लेकिन वह क्षण

ठहर गया कहीं,

शायद मेरे भीतर,

मेरी साँसों के बीच,

मेरी स्मृतियों की किसी अनजानी तह में।

और अब तो हद हो गई है—

वह छोटी-सी बात

इतनी बड़ी हो गई है

कि उसे छोटा कहने में भी

मन झिझकता है।

विवेक मौन है,

मन अशांत है,

और चित्त

किसी अनजाने भय से भरा है।

डरता हूँ—

कहीं यह केवल आकर्षण न हो,

कहीं यह मेरी कल्पना का संसार न हो,

कहीं मैं स्वयं ही

अपने बनाए हुए किसी स्वप्न में

जी तो नहीं रहा हूँ?

पर फिर सोचता हूँ—

यदि यह केवल भ्रम है,

तो इतना सच्चा क्यों लगता है?

यदि यह केवल चाहत है,

तो तुम्हारे दूर होने से

मन इतना खाली क्यों हो जाता है?

आज भी नहीं समझ पाया हूँ

कि स्वयं को क्या हुआ है।

किसी से कह भी नहीं सकता,

क्योंकि शब्दों में बाँधते ही

यह एहसास छोटा पड़ने लगता है।

जो बात इतनी छोटी थी,

वह इतनी बड़ी कैसे हो गई?

शायद बाहर

कुछ भी नहीं बदला—

वही रास्ते हैं,

वही मौसम हैं,

वही लोग हैं,

वही मेरी दुनिया है।

फिर भी

मेरी दृष्टि बदल गई है।

अब वही सुबह

कुछ और कहती है,

वही शाम

कुछ अधिक उदास लगती है,

हवा में भी

जाने किसकी आहट सुनाई देती है।

पहले तुम्हें देखना

अच्छा लगता था,

अब तुम्हें न देखना

अच्छा नहीं लगता।

पहले तुम्हारी याद

एक सुखद एहसास थी,

अब तुम्हारी याद

मेरी आदत बन गई है।

और शायद प्रेम यही है—

जब कोई व्यक्ति

हमारी दुनिया में आता नहीं,

बल्कि धीरे-धीरे

हमारी दुनिया का अर्थ बदल देता है।

पहले तुम

केवल अच्छे लगते थे,

फिर तुम्हारी प्रतीक्षा

अच्छी लगने लगी।

फिर तुम्हारी बातें,

तुम्हारी हँसी,

तुम्हारी चुप्पी—

सब कुछ अपना-सा लगने लगा।

और अब...

अब बात इतनी-सी नहीं रही।

अब तुम्हारे होने से

दुनिया थोड़ी सुंदर लगती है,

और तुम्हारे न होने से

सब कुछ होते हुए भी

कुछ अधूरा-सा लगता है।

शायद बाहर कुछ नहीं हुआ,

पर मेरी तो

पूरी दुनिया ही बदल गई।

पहले तुम

सिर्फ अच्छे लगते थे—

अब तुम्हारे बिना

कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

और सोचता हूँ,

जिसे मैंने कभी

“एक छोटी-सी बात” समझा था,

शायद वही

मेरे जीवन की

सबसे बड़ी बात थी।

— शिव मिश्रा

 ४ अक्टूबर 2026


Friday, October 2, 2026

एक छोटी सी बात

"एक छोटी सी बात"

          - शिव मिश्रा  

 

बात बहुत छोटी थी,

और बस इतनी सी थी,

कि तुम मुझे अच्छे लगते थे।

ये कब हुआ, और क्यों हुआ,

मैं कभी जान ही न पाया,

सोचा बहुत, पर समझ ही न आया,

ह्रदय के आगे तर्क को  बेबस पाया, 

लेकिन अब तो हद ही हो गई है,

बात बहुत ज्यादा आगे बढ़ गई है।

मन बहुत बेचैन है, विवेक उलझन में है, 

पर,  चित्त न जाने क्यों अपनी धुन में है।

अभी  तक तो  कुछ भी समझ नहीं पाया,

क्या हुआ,ये स्वयं को भी नहीं बता पाया।

जो बात इतनी छोटी थी,

कैसे इतनी बड़ी हो गई?

भले ही किसी और को दिखाई न दे,

पर मेंरी तो दुनिया ही बदल गई।

सबको सब कुछ पहले जैसा लग सकता है,   

पर मुझे तो कुछ भी सहज नहीं दिखता।

पहले तुम केवल अच्छे लगते थे,

अब तुम बिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

 

~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~

      मूल कृति मई 1982

 

 

 

 






 

 


Sunday, September 27, 2026

मौसम सुहाना हो गया है

मौसम सुहाना हो गया है

                   - शिव मिश्रा 

         ===================================


अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,

कि अब मौसम सुहाना हो गया है।

लगता है कोई अपना आस-पास है,

जिससे मिलने का बहाना हो गया है।

मौसम सुहाना हो गया है,

या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,

अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,

कि अब मौसम सुहाना हो गया है।


(१) 

तुम्हारे घर का कच्चा रास्ता भी,

न जाने क्यों मन को भाने लगा है।

उस पर चलने वाला हर अजनबी भी,

अब जाना-पहचाना सा लगने लगा है।

फूँस का जो छप्पर अखरता था मुझे,

वह भी आँखों को लुभाने लगा है।

गली के छोर का वह झाड़-झंखाड़ भी,

टेसू के फूलों सा खिलने लगा है।

मौसम सुहाना हो गया है,

या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,

अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,

कि अब मौसम सुहाना हो गया है।


(२) 

वो पगडंडी, वो उस पर धूल का उड़ना,

न जाने क्यों बहुत अच्छा लगने लगा है।

दूर से आती किसी अनजान आहट पर,

ये दिल कुछ ज़ोर से धड़कने लगा है।

टहनियों के संग मिल पेड़ भी जैसे,

प्रेम का पल्लव नया सजने लगा है।

अनसुना था किया जिस पवन-शोर को,

आज शांति का संदेश लाने लगा है।

मौसम सुहाना हो गया है,

या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,

अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,

कि अब मौसम सुहाना हो गया है।

 

(३) 

नीम का वह पेड़ जो घूरता था दूर से,

अब मुझे देख कर मुस्कुराने लगा है।

गाँव की हर गली का हर एक कण,

गीत कुछ प्यारा सा गुनगुनाने लगा है।

सांझ ढलने पर ये गाँव प्यारा लगे,

चाँद-तारों की कथाएँ सुनाने लगा है।

भोर की किरणें भी प्यार से सहला रहीं,

मन में उत्साह इक नया जगने लगा है।

मौसम सुहाना हो गया है,

या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,

अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,

कि अब मौसम सुहाना हो गया है।


(४) 

पेड़ पर चिड़ियाँ पुराना गीत ही गा रहीं,

पर गीत उनका मधुर अब लगने लगा है।

पुरवाई ने ली अंगड़ाई ये तो ठीक है,

पर मन पपीहा सा व्याकुल होने लगा है।

बाग में पहले भी खिलते थे सुन्दर फूल,

सौन्दर्य उनका मगर अब निखरने लगा है।

बाट क्यों जोहता हूँ किसी अनजान की,

जिसकी चाहत में ये दिल मचलने लगा है।

मौसम सुहाना हो गया है,

या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,

अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,

कि अब मौसम सुहाना हो गया है।


(५) 

वही चौखट, वही आँगन, वही खिड़की,

आज सब कुछ नया-सा क्यों लगने लगा है।

देख कर भी न देखा था जिस घर को कभी,

आज वह भी बहुत अपना लगने लगा है।

यह नियति का खेल है या कुछ और,

या कोई सपना भी सच होने लगा है।

कुछ नहीं बदला यहाँ, ये तो मालूम है,

पर न जाने मुझे आज क्या होने लगा है।


मौसम सुहाना हो गया है,

या मन मेरा बेठिकाना हो गया है,

अचानक न जाने कैसे हवा ये बदली,

कि अब मौसम सुहाना हो गया है।


        ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव प्रकाश मिश्रा ~~~~~~~~~

        मूल कृति 15 अगस्त 1985 ( भारतीय स्टेट बैंक की पत्रिका  "हम दोस्त" में प्रकाशित )