Tuesday, May 26, 2026

मां अगर तुम न होती ....


माँ, अगर तुम न होती…


माँ, अगर तुम न होती 

तो मैं ही कहाँ होता?

 इन साँसों की डोरी में 

कोई नाम कहाँ होता?

जब दुनिया ने ठुकराया, 

तुमने ही गले लगाया,

 मेरे हर टूटे सपने को

 आँखों में फिर सजाया।

मैं गिरकर भी उठ जाता हूँ, 

क्योंकि तुम साथ होती हो, 

अंधेरी राहों में भी मेरे, 

एक दीप-सी जलती हो।

मेरी पहली भाषा तुम, 

पहला विश्वास भी तुम, 

मेरे भीतर जो थोड़ा अच्छा है, 

उसका एहसास भी तुम।

दुनिया के तीखे बाणों से, 

तेरी दुआएँ सदा बचाती हैं, 

मैं जब भी थककर हारूँ तो, 

तेरी थापियाँ हौसला बढ़ाती हैं।

भूखा ही सो जाता शायद,

 जो तेरी ममता का निवाला न होता, 

सूनी पड़ जाती यह दुनिया, 

जो तेरे आँचल का उजाला न होता।

मेरी हर छोटी जीत पर

 तुम्हारी आँखें चमक उठती हैं,

 और मेरी हर पीड़ा में 

तुम चुपचाप सिसकती हो।

ये शब्द, ये स्वर, ये मेरी समझ, 

सब तेरी ही तो थाती है,

 मैं जो कुछ भी लिख पाता हूँ,

वह तेरी ही सीख कहलाती है।

माँ, तुम केवल रिश्ता नहीं, 

जीवन का आधार हो, 

ईश्वर दिखे न दिखे, 

मेरे लिए तुम ही संसार हो।

माँ, अगर तुम न होती

 तो मैं ही कहाँ होता?

 इस भीड़ भरी दुनिया में 

मेरा नामों निशाँ न होता ।

~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~



Tuesday, December 23, 2025

चूहे

“चूहे”

रात के सन्नाटे में घर बहुत शांत लगता था।
इतना शांत कि दीवारों की साँसें भी सुनाई देने लगती थीं।

और तभी—
एक हल्की-सी खड़खड़ाहट।

पहले लगा, शायद हवा होगी।
फिर लगा, पुरानी लकड़ी का कोई टुकड़ा हिला होगा।
लेकिन आवाज़ लौटकर फिर आई—
नन्हे, तेज़ क़दमों की।

चूहे।

वे दिखाई नहीं देते थे,
लेकिन उनकी मौजूदगी हर जगह महसूस होती थी—
रसोई के कोने में,
अलमारी के नीचे,
और मन के भीतर भी।

मैंने सोचा, उन्हें नज़रअंदाज़ कर दूँ।
पर जितना उन्हें अनदेखा किया,
उतना ही वे बढ़ते गए—
आवाज़ों में,
निशानों में,
और डर में।

रातों की नींद टूटने लगी।
हर छोटी-सी आवाज़ एक चेतावनी बन गई।
दिल तेज़ धड़कने लगा—
जैसे घर अब मेरा नहीं रहा।

मैंने उपाय किए—
जाल लगाए,
दरारें बंद कीं,
कमरे साफ़ किए।

लेकिन असली समस्या
चूहों से ज़्यादा
मेरे मन में थी।

क्योंकि चूहे सिर्फ़ घर में नहीं थे—
वे चिंता बनकर
मेरे भीतर घूम रहे थे।

एक दिन समझ आया—
डर से लड़ने के लिए
हर चीज़ को खत्म करना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ डर बस यह याद दिलाने आते हैं
कि हम कितने नाज़ुक हैं।

उस रात फिर आवाज़ आई।
मैं चौंका नहीं।

मैंने गहरी साँस ली
और अँधेरे को वैसे ही रहने दिया।

कभी-कभी
डर को पहचान लेना ही
काफ़ी होता है।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

   - शिव मिश्रा 

( Lydia Davis की कहानी  The Mice से प्रेरित )

Sunday, March 9, 2025

छोटा सा बादल

विस्मित  मुस्कान हो,
    लाल आसमान हो,
        पलकें  उठें  झुकें,
            लब थर-थराएँ रुकें ,
                पास तुम बैठी रहो,
                    लहराती आंचल. II1II

गुल मोहर खिले कहीं
    दो पल मिलें कहीं
        और एक साथ गिनें
            हृदय की धडकनें 
                चांदनी ढके रहे
                    छोटा सा बादल.. II2II


****शिव प्रकाश मिश्र ******

              ( मूल कृति जुलाई १९८०)  

तुम्हारी हंसी...



है फूलों-सी नाज़ुक तुम्हारी हँसी,

 कितनी प्यारी दुलारी तुम्हारी हँसी।

ज़िन्दगी धूप में तप रही रेत है,

 प्यार की छाँव देती तुम्हारी हँसी।

कोई सावन कहीं झूम के आ गया,

 है फुहार-सी झरती तुम्हारी हँसी।

मन पपीहा-सा व्याकुल फिरे घूमता,

 है स्वाति की बूँद तुम्हारी हँसी।

चाँद बादल में जाने कहाँ जा छिपा, 

है सितारों का उपवन तुम्हारी हँसी।

एक उफनती नदी तोड़ बंधन चली,

 मोहक झरने बनाती तुम्हारी हँसी।

मोर जंगल में नाचे प्रकृति खिल उठे, 

और घुँघरू बजाती तुम्हारी हँसी।

मृग बन मन भटक ढूँढ़ता फिर रहा, 

कोष कस्तूरी का है तुम्हारी हँसी।

सुर्ख जोड़ा पहन एक दुल्हन सजी, 

कंगनों-सी खनकती तुम्हारी हँसी।

एक तूफ़ान आकर कहीं थम गया, 

शोख़ बिजली गिराती तुम्हारी हँसी।

शब्द होंठों पे आयें न आया करें, 

मूक आमंत्रण देती तुम्हारी हँसी।

दिल की अमराइयों में बसंत आ गया

कूक कोयल की मीठी तुम्हारी हँसी।

तुम रहो न रहो ये रहेगी हँसी, 

रोज़ मुझको रुलाती तुम्हारी हँसी।


****************
--शिव प्रकाश मिश्र

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Wednesday, July 12, 2023

बच्चे बड़े हो गए



सुबह उगती है, 

और शुरू हो जाती है, 

चहचहाहट घोंसले में, 

जो मेरे बगीचे में बना है, 

और जिसे मैं देखता हूँ, 

खिड़की से झांक कर हर रोज.

शाम को फिर बढ़ जाती है हलचल चहचहाने की, 

आहट भी नहीं होती है, 

रात गहराने की.

हर दिन ऐसे ही शुरू होता है,

और हर रात भी, 

कुछ इसी तरह.

पता नहीं, 

इनके पास हैं 

कितनी खुशियाँ? 

अनमोल पल? 

कितनी तरंगें?

 कितनी उमंगें?

इनके ऊर्जा पात्र 

जैसे अक्षय हो गए हैं, 

हर चीज को मानो पंख लग गए हैं.

एक जोड़ा चिड़ियों का और उनके दो छोटे बच्चे, 

यही सब उनका पूरा संसार बन गए हैं. 

जो देते हैं अविरल, 

अतुल अहसास, 

जैसे सृष्टि का सृजन और क्रमिक विकास.

हर तरफ हरियाली, 

मनमोहक हवाएं 

स्वच्छ खुला नीला आकाश, 

अबोध-विस्मय, 

तार्किक-तन्मय, 

संयुक्त आल्हाद और अति विश्वास.

स्वयं का, 

प्रकृति का, 

या परमात्मा का, 

पता नहीं, 

पर न गर्मी का गम, 

न चिंता सर्दी की,

 न वर्षा का भय, 

न आशंका अनहोनी की,

 व्यस्त और मस्त हरदम,

 बच्चों के साथ,

जैसे बच्चे ही जीवन हैं, 

उनका, 

बच्चों का पालन-पोषण, 

हर पल ध्यान रखना, 

बड़े से बड़ा करना,

 लक्ष्य है उनके जीवन का.

सोना, 

जागना, 

खेलना,

 कूदना, 

उनके साथ,

 खुश रखना, 

खुश रहना साथ-साथ, 

उनके बचपन में समाहित करना, 

अपना जीवन, 

पुनर्परिभाषित और पुनर्निर्धारित करना, 

खुद का बचपन.

कितने ही मौसम आए

गए, 

समय के बादल भी उमड़े-घुमड़े और बरस कर चले गए.

खिड़की से बाहर बगीचे में,

 अब, 

जब मैं झांकता हूँ,

 तो पाता हूँ, 

घोंसले हैं,

 कई हैं, 

आज भी, 

और चहचहाहट भी, 

उसी तरह कुछ-कुछ,

पर सामान्य नहीं है, 

सब कुछ, 

उस घोंसले में, 

जिसे मैं लंबे समय से देखता आया हूँ,

 जिसकी चहचहाहट शामिल थी,

 मेरी दिनचर्या में, 

जिसकी यादें आज भी रची-बसी हैं, 

मेरे अंतर्मन में.

ऐसा लगता है, 

जैसे मैं स्वयं अभिन्न हिस्सा हूँ, 

उनके जीवन का, 

और उस घोंसले का, 

या वे सब और वह घोंसला, 

यथार्थ है, 

मेरे जीवन का.

आज भी जीवित है, 

चिड़ियों का वह प्रौढ़ जोड़ा, 

और रहता भी है, 

उसी घोंसले में, जहाँ अब चहचहाहट नहीं है,

 कोई हलचल भी नहीं है.

चलते, 

फिरते, 

उठते-बैठते,

 झांकता हूँ मैं,

 बार-बार उसी घोंसले में, 

जहाँ अब बच्चे नहीं हैं.

मूक दृष्टि से पूछता हूँ मैं, 

जब इस जोड़े से, 

जो मिलते हैं यहाँ-वहाँ बैठे हुए, 

गुमसुम, 

बहुत शांत और उदास से,

उनकी खामोश निगाहें,

कहती हैं बड़ी बेचैनी से, 

“बच्चे बड़े हो गए", 

"... बहुत दूर हो गए",

"अब तो उनकी चहचहाहट भी यहाँ नहीं आती है”

 "आती है तो सिर्फ उनकी याद आती है"

बहुत व्यथित हूँ, 

विचलित हूँ, 

और सोचता हूँ, 

जैसे कल की ही बात है, 

सारा घटनाक्रम आत्मसात है,

पर मुट्ठी में बालू की तरह,

 समय को भी कोई संभाल सका है भला?

पता ही नहीं चला..... 

कब .....? 

बच्चे बड़े हो गए.

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-           - शिव प्रकाश मिश्रा 

प्यार की दुकान


प्यार की दुकान

हर तरफ़ नफ़रत ही नफ़रत फैलाई गई है यहाँ,
दम घुटता है — साँस लेने में भी डर लगता है।

ढूँढ़ता हूँ कि मिल जाए मोहब्बत का ढाबा कहीं,
भूख से डरता हूँ, पर कुछ खाने का मन करता है।

हो रहा है जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग यहाँ,
अब तो कुछ करते नहीं, फिर भी डर लगता है।

मीडिया बिक चुका, ख़तरे में है संविधान यहाँ,
क्या करें — इस देश में रहने में भी डर लगता है।

न रोज़गार है और न बचा आय का साधन कोई,
अब तो भाईचारे की खेती से भी डर लगता है।

नफ़रती बाज़ार में खोली है प्यार की दुकान हमने,
न जाने क्यों खरीदार को आने में भी डर लगता है।

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    - शिव मिश्रा 

दिनांक- ५ जनवरी २०२३       

 

       

Wednesday, August 31, 2022

आतंकी प्यास

 

आतंकी प्यास

प्यास से व्याकुल एक व्यक्ति ने

एक घर का दरवाज़ा खटखटाया।

 एक कवि-नुमा चेहरा बाहर आया,

 जिसे देखकर वह व्यक्ति बोला— 

‘प्यासा हूँ, अगर... पानी...!’

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं!” कहकर कवि ने,

 उसे ड्राइंग रूम में बैठाया,

 ख़ुद बैठकर बोला—

 कल भी मैं प्यासा था,

 आज भी मैं प्यासा हूँ,

 सब कुछ आस-पास है,

 फिर भी दिल उदास है,

 न जाने कैसी प्यास है?

प्यासे व्यक्ति को बात समझ नहीं आई,

 कवि ने बात थोड़ी आगे बढ़ाई—

 "वह था ग्यारह सितंबर,

 अमेरिका पर आतंकी क़हर!

 उसी के अपहृत विमानों को

 वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकरा दिया,

 एक सौ दस मंज़िली बिल्डिंग को धूल में मिला दिया।

 हज़ारों सिसकियाँ मलबे में दफ़्न हो गईं,

 समूचे विश्व की आत्मा दहल गई।

 कौन थे हमलावर?

 क्या उद्देश्य था?

 इसका आभास है,

 न जाने कैसी प्यास है?"

प्यासा व्यक्ति घबड़ाया,

 उसे लगा कि कवि उसकी बात समझ नहीं पाया।

 उसने सोचा विज्ञापन की भाषा में समझाए,

 शायद कवि समझ जाए!

 यह सोचकर बोला—

“ये दिल माँगे मोर!”

 कवि ने कहा—“श्योर!”

और बोला—

 वे पूरी दुनिया की करते थे निगरानी,

 पर अपने घर की बात न जानी।

 चार-चार विमान एक साथ अपहृत हो गए,

 दुनिया के सुरक्षिततम पेंटागन पर हमले हो गए!

 अब आतंकी साए में आतंकियों की तलाश है,

 न जाने कैसी प्यास है?

प्यासा व्यक्ति चिल्लाया— “ओह नो!”

 कवि बोला—“यस

 इतिहास गवाह है,

 जो भस्मासुर बनाता है,

 वह उसी के पीछे पड़ जाता है।

 आतंकवाद का दर्द भी तभी समझ में आता है,

 जब कोई स्वयं इसकी चपेट में आता है।

 आतंकवाद से लड़ने के लिए वे उसी के साथ खड़े हैं,

 जिसके तार आतंकवादियों से जुड़े हैं!

 आतंकवाद से लड़ने का यह अधूरा प्रयास है,

 न जाने कैसी प्यास है?"

प्यासा व्यक्ति निढाल हो सोफ़े पर लुढ़क गया,

 यह देख कवि-पत्नी का हृदय पिघल गया।

 बोली—

 "न आप अमेरिका हैं,

 न पाकिस्तान,

 न रूस हैं,

 न अफ़ग़ानिस्तान!

 आप भारत हैं,

 और भारत को दूसरों की आस छोड़नी होगी,

 और आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी होगी।

 इस बेचारे को नाहक सता रहे हो,

 पानी की जगह कविता पिला रहे हो!

 यह मूर्छित व्यक्ति कोई और नहीं,

 स्वयं ओसामा बिन लादेन है...

 क्या इसका तुम्हें एहसास है?

 न जाने कैसी प्यास है?

 न जाने कैसी प्यास है?"

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- शिव मिश्रा 

( मूल कृति २ अक्टूबर 2001)

हम दोस्त पत्रिका में प्रकाशित