माँ, अगर तुम न होती…
माँ, अगर तुम न होती
तो मैं ही कहाँ होता?
इन साँसों की डोरी में
कोई नाम कहाँ होता?
जब दुनिया ने ठुकराया,
तुमने ही गले लगाया,
मेरे हर टूटे सपने को
आँखों में फिर सजाया।
मैं गिरकर भी उठ जाता हूँ,
क्योंकि तुम साथ होती हो,
अंधेरी राहों में भी मेरे,
एक दीप-सी जलती हो।
मेरी पहली भाषा तुम,
पहला विश्वास भी तुम,
मेरे भीतर जो थोड़ा अच्छा है,
उसका एहसास भी तुम।
दुनिया के तीखे बाणों से,
तेरी दुआएँ सदा बचाती हैं,
मैं जब भी थककर हारूँ तो,
तेरी थापियाँ हौसला बढ़ाती हैं।
भूखा ही सो जाता शायद,
जो तेरी ममता का निवाला न होता,
सूनी पड़ जाती यह दुनिया,
जो तेरे आँचल का उजाला न होता।
मेरी हर छोटी जीत पर
तुम्हारी आँखें चमक उठती हैं,
और मेरी हर पीड़ा में
तुम चुपचाप सिसकती हो।
ये शब्द, ये स्वर, ये मेरी समझ,
सब तेरी ही तो थाती है,
मैं जो कुछ भी लिख पाता हूँ,
वह तेरी ही सीख कहलाती है।
माँ, तुम केवल रिश्ता नहीं,
जीवन का आधार हो,
ईश्वर दिखे न दिखे,
मेरे लिए तुम ही संसार हो।
माँ, अगर तुम न होती
तो मैं ही कहाँ होता?
इस भीड़ भरी दुनिया में
मेरा नामों निशाँ न होता ।
~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~