Tuesday, September 15, 2026

न मैं बोलूँ, न तुम बोलो ..

न मैं बोलूँ, न तुम बोलो ..   मौन की भाषा 

      ~शिव मिश्रा 



न तुम कुछ बोलो, न मैं कुछ बोलूँ,

इस ख़ामोशी में हो जाएँ गुम,

बस एक नज़र से दुनिया देखें,

यूँ ही सदा साथ रहें हम-तुम।


न शब्दों में ढले, न होंठों पर आए,

वह सब कुछ आँखों में दिख जाए,

जो कह न सके, जो सुन न सके,

वह चेहरे पर ही झलक जाए।



शांति का भी इक स्वर होता है,

और मौन बहुत कुछ कहता है;

यह कैसी भाषा है जिसको,

शब्दों की कोई चाह नहीं,

कहना नहीं, समझना है बस,

सुनने का कोई काम नहीं।



जब पुरवाई-सी आती हो तुम,

कुछ सकुचाई, कुछ शरमाई,

बाग़-बगीचा महक उठे यूँ,

जैसे कोई घटा घिर आई;

तन-मन पर अमृत ढलकाती,

क्या जादू कर जाती हो?

ये सावन की बूँदें हैं, या

मधुरस तुम बरसाती हो?



बस यही चाह, भीगता रहूँ

जीवन भर हर मौसम में,

अब न कोई इच्छा कहने की,

न कोई तृष्णा बाकी मन में;

जब साथ हमारे होती हो तुम,

यह मौन मुखर हो जाता है,

मन के सूखे उपवन में भी

फिर से स्पंदन जग जाता है।



लता लजाती और लिपटती,

पेड़ों की पत्तियाँ ठिठकतीं,

बुलबुल रुकती, कोयल सुनती,

मलय-पवन भी तनिक ठहरती;

उन्हें देख लगता है मुझको,

शायद तुम कुछ कहने वाली हो,

पर कहने-सुनने को क्या बचता,

जब इतना सब कह जाती हो!

शिव मिश्रा

(मूल कृति: २० जनवरी १९८८)


Monday, September 7, 2026

क्या तुमने कुछ सुना?


              क्या तुमने कुछ सुना?

                 - शिव प्रकाश मिश्रा 


क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?

कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।

प्रकृति के इस आयोजन में, कण-कण बोल रहा था,

बिन शब्दों के मौन गगन भी, रस में डोल रहा था।

क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?

कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।

 (१)

ऊपर से था शांत समंदर, भीतर ज्वार उठा था,

जैसे उसकी नीरवता में, कोई राग छुपा था।

महा-ज्वार से पहले सागर, जैसे मौन ठहरता,

मन के अंतर का तूफ़ान भी, बाहर कहां उभरता!

क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?

कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।

 (२)

सूरज के आने से पहले, उषा सिंदूर सजाती,

अँधियारे को दूर भगाकर, पथ उज्ज्वल कर जाती।

चहक उठी थीं चिड़ियाँ सारी, हँसती डाली-डाली,

धरती के आंचल में भर दी, भोर ने नूतन लाली।

क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?

कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।

 (३)

जो शब्दों में ढल न सका, वह अनहद नाद जगाता,

शांत क्षितिज के पीछे छिपकर, जीवन भी मुस्काता।

जो सुन लेता मौन प्रकृति का, वह खुद को सुनता है,

इन पावन संकेतों में वह, अपना जीवन चुनता है।

क्या तुमने भी कभी सुना, जो कोयल ने है गाया?

कली-कली तब मचल उठी, जब भौंरा गुनगुनाया।



~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~

    ( मूल रचना - शिक्षक दिवस २०२६ )

Saturday, August 29, 2026

सावन की कसमसाहट

 सावन की कसमसाहट

      ~~ शिव मिश्रा 


ये सावन जा रहा है,  मुझसे कह रहा है, 

भीगने में जो मज़ा है, वह बचने में कहाँ है।

कुछ देर ठहर जाओ,  ये  मेरी इल्तज़ा है, 

कागज़ की नाव का वो, मौसम बुला रहा है। 

मिट्टी की सोंधी खुशबू,  जैसे कोई नशा है,

भीगा हुआ वो बचपन, सावन में आ बसा है।

अब छतरियों के नीचे, जो अक्स छुप रहा है, 

लगता है ज़िंदगानी से, थोड़ा खफ़ा-खफ़ा है।

रुक कर ज़रा नहा लो, ये वक़्त कह रहा है,

सब उलझनों की शायद, बारिश ही इक दवा है।

खिड़की के काँच पर जो, पानी फिसल रहा है, 

तेरी छुअन का दिल को, एहसास दे रहा है। 

पर्दे से झांकने की, वो जो तेरी  हया है,

ये भीगता सा मौसम,  उस पर ही तो टिका है।

भीगी हुई लटों से,  पानी टपक रहा है, 

मेरे करीब आ जा,  मौसम की ये रज़ा है। 

तेरी नज़र का जादू, बारिश में घुल रहा है, 

तेरे बिना ये सावन, मेरे लिए सज़ा है।

सीने से लग के तेरे, छुपने में जो मज़ा है,

दुनिया की हर नज़र से, बचने की ये अदा है।

ठंडी हवा का झोंका, जब भी गुज़र रहा है,

बस तेरी धड़कनों का पैगाम ला रहा  है।

~~~~~~~~~~~~~~~

- शिव मिश्र 

मूलकृति - रक्षा बंधन , २८ अगस्त २०२६  


Sunday, August 23, 2026

पितृसत्ता

 

      पितृसत्ता

         — शिव प्रकाश मिश्रा 

(१)

पितृसत्ताक्या केवल पुरुष-प्रधान समाज है?
या वह व्यवस्था भी, जो परिवार को सँभालती है?

यह एक ऐसी सत्ता है,
जो पुरुष को रोने भी नहीं देती।
भूले-भटके आँसू आ भी जाएँ,
तो वह उन्हें इस तरह छिपाता है कि कोई देख न पाए।

पुरुष भी इस पितृसत्ता का एक वाहक है
कई बार उसका लाभार्थी,
और कई बार उसका पीड़ित भी।

वह चाहे पुत्र हो, पति हो या पिता,
उसे बचपन से ही मजबूत बने रहने का पाठ पढ़ाया जाता है,
और अनजाने ही उसी कठोरता में ढलना सिखाया जाता है।

जैसे-जैसे वह पुत्र से पति
और फिर पिता बनने की यात्रा करता है,
उसके भीतर भी पितृसत्ता का आकार 
धीरे-धीरे बड़ा होने  लगता  है।

दुखद से दुखद और विषम परिस्थितियों में भी
न रोना, न आँसू बहाना
उसके मजबूत दिखने का आधार बन जाता है।

(२)

वह भीतर से मजबूत भले ही न हो,
लेकिन मजबूत दिखाई देना उसकी मजबूरी है,
और शायद जिम्मेदारी भी;

क्योंकि अगर पिता ही रोएगा,
तो औरों को ढाँढस कौन बँधाएगा?

शायद यही कारण है
कि कोई पुरुष खुलकर रोता-बिलखता दिखाई नहीं पड़ता।

पितृसत्ता की यही मजबूती
और स्वभाव की यह दृढ़ता,
भले ही दिखावटी हो,
फिर भी माँ को भरपूर संबल देती है।

इसीलिए माँ
अपनी करुणा में निर्बाध बह सकती है,
ममता के सागर में
स्वच्छंद हिलोरें ले सकती है।

जब कभी उसकी करुणा के तार
असहनीय पीड़ा से झंकृत होते हैं,
तो वह रोती है, बिलखती है,
फिर अपने ही आँचल से आँसू पोंछकर
स्वयं को सामान्य कर लेती है।

(३)

लेकिन पिता?
वह तो रो नहीं सकता।

कभी-कभी, जब दुःख का जलस्तर
अनायास बढ़ जाता है
और धैर्य के बाँध को लाँघकर बहने लगता है,
तो वह दृश्य बहुत ही असामान्य होता है।

तब भी बाँध की ऊँचाई बढ़ाना ही
एकमात्र विकल्प माना जाता है

जो न उचित और न जरूरी है,
लेकिन शायद यही पितृसत्ता की सबसे बड़ी मजबूरी है।

(४)

परंतु आज,
जब सब कुछ इतना बदल जाए
कि कुछ समझ ही न आए,
तो इसे क्या कहा जाए?

बदलते युग में परिवार बदल रहे हैं,
माँ, बाप और बच्चों के बीच के रिश्ते बदल रहे हैं।

घट रही है अपनेपन की गर्माहट,
संवेदनाओं की आहट,
और पारिवारिक संस्था के संस्कारों की समझ।

धीरे-धीरे यह परिवार
कॉरपोरेट जगत जैसी एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था बन रहा है;

जिसमें रिश्ते नहीं,
केवल वरिष्ठता और कनिष्ठता शेष है।

यहाँ कोई सिर्फ इसलिए वरिष्ठ है
क्योंकि उसने इस संस्था में पहले प्रवेश किया है,
और उसका सेवा-काललंबा है।

(५)

इसके अतिरिक्त कोई विशेष अंतर नहीं रह गया है
सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं में
केवल कर्मचारी-से रह गए हैं।

आज का कनिष्ठ कल वरिष्ठ हो जाएगा,
और वरिष्ठ एक दिन
इस दुनिया से रिटायरहो जाएगा।

समय का चक्र है,
ऐसे ही चलता रहेगा।

लेकिन यह यक्ष-प्रश्न
आज भी अनुत्तरित है

क्या परिवार में जब साधन कम होते हैं,
तब प्यार और ममता ज्यादा होती है?

साधन और संसाधन बढ़ते ही
ममता के बंधन ढीले क्यों हो जाते हैं?

अपनापन अपने आप ही
क्यों सूखने लगता है?

और अपनों के लिए किया गया
वह आजीवन संघर्ष...
अंततः कहाँ खो जाता है?

(६)

शायद इन प्रश्नों का उत्तर
हमारी इसी भूल में छिपा है

कि हमने सुविधाओंको ही
संवेदनामान लिया है।

हम भूल गए हैं कि
परिवार रूपी वृक्ष भौतिक संसाधनों की चमक से नहीं,
बल्कि उसी मौन पसीने
और अनबहे आँसुओं की नमी से सींचा जाता है।

जिस दिन यह नव-निर्मित
कॉरपोरेट व्यवस्था
पिता की उस थोपी गई कठोरता के पीछे का रुदन
और माँ की करुणा का वास्तविक मोल समझ लेगी,

उस दिन साधन भले ही कम हों,
अपनापन फिर से लहलहा उठेगा।

क्योंकि अंततः
घर ईंट-गारे और वरिष्ठता से नहीं,
बल्कि बिसरा दिए गए
समर्पणऔर प्रेमसे आकार लेता है।


   - शिव मिश्रा 

   मूल कृति: दिसम्बर २०१८