Saturday, October 24, 2026

"तुम्हारा होना"

"तुम्हारा होना"

          — शिव मिश्रा

जब तुम साथ होती  हो,

तो बात बहुत बड़ी हो जाती है,

मेरी दुनिया सिमटकर इतनी छोटी हो जाती है

कि बिना किसी प्रयास के ही

मेरी मुट्ठी में समा जाती है।

 

मलयगिरि से चलकर हवाएँ

सीधे मेरे पास आती हैं,

और हँस-हँसकर मुझसे

प्रेम भरी बातें करती हैं।

विस्मित दिशाएँ सकुचाती हैं,

लजा कर  मौन हो जाती हैं,

जैसे मेरे इस अनोखे सुख से

वे भी कुछ-कुछ घबराती हैं।

 

मैं  बहुत बड़ा हो जाता हूँ,

 सातवें आसमां  पर पहुँच जाता हूँ,

जहाँ सितारों को छू सकता हूँ,

चाँद से बातें कर सकता हूँ,

बादलों के साथ लुका  छिपी खेल सकता हूँ।

पहाड़ों के सर्वोच्च शिखरों को

बड़े प्यार से सहला सकता हूँ,

बौने से लगते ऊंचे  पेड़ों की 

 नव कोपलों को छू सकता हूँ,

ओस की नन्हीं-नन्हीं बूँदों को

अपनी हथेलियों में रोक सकता हूँ।

 

समुद्र का ज्वार मुझे छूने की

बहुत ज़िद करता है,

मेरे चरणों तक आने को

बार-बार मचलता है,

पर  थक-हारकर लौट जाता है,

शायद मेरे सुख की सीमा

वह भी समझ नहीं पाता है।

 

रात्रि  नीरवता भर  लाती है, 

केवल मुझे सुलाने के लिए आती है,

सुबह मेरे जागने की प्रतीक्षा में

रात भर ठहर जाती है,

और उषा तो मेरे स्वागत में

रंगों से सजा थाल लेकर आती है।

सूरज की पहली किरण भी

मुझसे कुछ कहने को मुस्काती है,

लगता है, मेरी हर सुबह

तुम्हारे होने का उत्सव मनाती है।

 

तुम मेरे साथ हो,

यह सावन की फुहार बताती है,

कोयल अपने मधुर गीतों में

शायद इसी खुशी को गाती है।

फूलों की महक तुम्हारे होने का

हर पल भान कराती है,

और हवा की हर मीठी छुअन

तुम्हारा संदेश ले आती है।

 

गर्मी, सर्दी और बारिश भी

तुम्हारे बदलते तेवरों की याद दिलाती हैं,

कभी तुम्हारा रूठना, कभी मनाना,

कभी चुप रहना, कभी मुस्काना—

ऋतुएँ जाने क्यों

तुम्हारी ही कहानी दोहराती हैं।

धूप में तुम्हारी तपिश है,

छाँव में तुम्हारा दुलार,

बारिश में जैसे तुम्हारी हँसी,

सर्द हवाओं में तुम्हारा प्यार।

 

कभी लगता है, तुम यहीं कहीं हो आसपास,

कभी लगता है, मेरे भीतर ही

गूँज रहा तुम्हारा मीठा आभास।

तुम्हें ये सब मालूम भी है या नहीं,

मेरी  इन अनुभूतियों का

कुछ एहसास भी है या नहीं?

तुम्हारे लिए शायद यह

एक साधारण-सी बात हो,

लेकिन मेरे लिए तो

हर पल एक नई सौगात है।

 

मुझे तो यह भी मालूम नहीं

कि मैं इतना सब कैसे सहेजूँ,

इन अनगिनत अनुभूतियों को

किस शब्द में, किस भाव में समेटूँ?

और सबको यह संदेश कैसे भेजूँ

कि तुम्हारे साथ होने भर से

मेरी दुनिया कितनी बदल जाती है,

एक साधारण-सी ज़िंदगी भी

कितनी असाधारण हो जाती है।

 

शायद कुछ बातें कही नहीं जातीं,

कुछ अनुभूतियाँ लिखी नहीं जातीं,

और प्रेम की कुछ अनकही कहानियाँ

शब्दों में पूरी नहीं होतीं।

बस इतना जानता हूँ—

जब तुम साथ होती हो,

तो दुनिया केवल सुंदर नहीं होती,

मेरे होने का अर्थ भी

पहले से कहीं अधिक सार्थक हो जाता है।

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-  शिव प्रकाश मिश्रा 

   मूल रचना: जनवरी 2019

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