Tuesday, February 23, 2016

रोज़ी और रोटी

मेरी कहानी
बिखर रही है,
स्वप्निल प्रासाद में,
रोशनी खुद भटक रही है,
कांप रहा है मेरा भविष्य,
मेरे ही हांथो में.
जान बूझ कर
डालता है कोई,  गरम रेत,
मेरे फूटे हुए छालो में.
विचारो के वातायन से
गिर रहा हूँ मै,
धरती पर,
पग पग पर,
ठोकर ,
और
हर ठोकर पर
वास्तिविकता का एक नया अनुभव.
आ पड़ा है मेरे दिल पर
एक भारी भरकम बोझ अनायास ही,
असंतुलित से कदम,
पड़ रहे है,
कहीं के कहीं.
मिल रही है,
कृतिमता,छुद्रता और समस्याओं की
असहनीय चिकौटी,
मेरे नेत्रों के धुंधलके में,
चमक रहे है सिर्फ दो शब्द,
रोज़ी और रोटी.........!
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     शिव प्रकाश मिश्र
    मूल कृति मई 1980
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