रोज़ी और रोटी— शिव प्रकाश मिश्रा
(मूल कृति: मई १९८०)
मेरी कहानी बिखर रही है
एक स्वप्निल प्रासाद में,
रोशनी ख़ुद भटक रही है,
काँप रहा है मेरा भविष्य... मेरे ही हाथों में!
जान-बूझकर डालता है कोई गरम रेत,
मेरे फूटे हुए छालों में।
विचारों के वातायन से गिर रहा हूँ मैं धरती पर,
जहाँ पग-पग पर है ठोकर,
और हर ठोकर पर... वास्तविकता का एक नया अनुभव!
आ पड़ा है मेरे दिल पर
एक भारी-भरकम बोझ अनायास ही,
असंतुलित-से कदम पड़ रहे हैं कहीं के कहीं।
मिल रही है कृत्रिमता, क्षुद्रता और समस्याओं की
यह असहनीय चिकोटी!
मेरे नेत्रों के धुँधलके में,
चमक रहे हैं सिर्फ़ दो शब्द—
रोज़ी और रोटी.........!
=================शिव प्रकाश मिश्रमूल कृति मई 1980=================
Tuesday, February 23, 2016
रोज़ी और रोटी
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