Friday, February 19, 2016

प्रेम बंधन .......



प्रेम बंधन

— शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति : मई 1979 | विस्तारित एवं परिष्कृत : अगस्त 2026)

ज़िंदगी के मोड़ ले आए कहाँ पर,

मैं सुबह से शाम तक चलता गया।

कल्पना का इंद्रधनुषी मधुर उपवन,

कर्मनाशा की लहर को छू गया।

आग-सी तपती क्षुधा की रेत पर,

कामना का बीज कोई बो गया।

आस्था के चंद सीमित बिंदुओं में,

सत्य ख़ुद का ही बवंडर बन गया।

वक्त की आँधी ले उड़ी सुखद स्मृतियाँ,

स्वप्न जो आँखों में कोई संजो गया।

ढूँढता हूँ आज भी वो स्मृति-कोष,

वक्त का दरिया जिन्हें भी धो गया।

स्वार्थ की बस्ती में हर कोई यहाँ पर,

छोड़कर रिश्ते, तिजोरी ले गया।

भूलकर दायित्व का वह बोध,

आदमी ख़ुद में ही जैसे खो गया।

टूटते-जुड़ते रहे कुछ फ़ासले यूँ,

कौन जाने, क्या मिला, क्या खो गया।

उम्र भर आवाज़ देते रहे रिश्ते,

जिसे सुनना था, वह भी अनसुना कर गया।

उम्र की चौखट पर ठहरी साँझ में,

अतीत का साया दुबककर आ गया।

जो कभी था परम प्रिय जीवन भर,

वक्त की धारा में वह भी बह गया।

मुट्ठियों में रेत-से फिसले कई अपने,

ईश जाने, कौन कब और क्यों गया।

कुछ अधूरी चाहतें दिल में दबी हैं,

कुछ को समय की धूल ढँक गया।

प्रेम की डोरी बनी साँसों की डोरी,

जुड़ती-टूटती, फिर मैं जोड़ता रह गया।

दूरियाँ हर बार बाधक बनीं,

पर इस बार एक रिश्ता बच गया।

प्रेम के बंधन बँधे हैं रबड़-जैसे,

पास होकर दूर कोई कर गया... 


                         ~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~ 

                        (मूल कृति : मई 1979 | विस्तारित एवं परिष्कृत : अगस्त 2026)


प्रेम बंधन .......

— शिव प्रकाश मिश्रा

ज़िंदगी के मोड़ ले आए कहाँ पर, 

मैं सुबह से शाम तक चलता गया।

कल्पना का इंद्रधनुषी मधुर उपवन, 

कर्मनाशा की लहर को छू गया!

आग-सी तपती क्षुधा की रेत पर, 

कामना का बीज कोई बो गया।

आस्था के चंद  सीमित बिंदुओं में, 

सत्य ख़ुद का ही बवंडर बन गया!

प्रेम के बंधन बँधे हैं रबड़-जैसे, 

पास होकर दूर कोई कर गया...


**********************

शिव प्रकाश मिश्र
मूल कृति - मई 1979  
*********************

     

No comments:

Post a Comment