Friday, February 19, 2016

प्रेम बंधन .......


प्रेम बंधन .......

— शिव प्रकाश मिश्रा

ज़िंदगी के मोड़ ले आए कहाँ पर, 

मैं सुबह से शाम तक चलता गया।

कल्पना का इंद्रधनुषी मधुर उपवन, 

कर्मनाशा की लहर को छू गया!

आग-सी तपती क्षुधा की रेत पर, 

कामना का बीज कोई बो गया।

आस्था के चाँद सीमित बिंदुओं में, 

सत्य ख़ुद का ही बवंडर बन गया!

प्रेम के बंधन बँधे हैं रबड़-जैसे, 

पास होकर दूर कोई कर गया...


**********************

शिव प्रकाश मिश्र
*********************

No comments:

Post a Comment