प्रेम बंधन .......
— शिव प्रकाश मिश्रा
ज़िंदगी के मोड़ ले आए कहाँ पर,
मैं सुबह से शाम तक चलता गया।
कल्पना का इंद्रधनुषी मधुर उपवन,
कर्मनाशा की लहर को छू गया!
आग-सी तपती क्षुधा की रेत पर,
कामना का बीज कोई बो गया।
आस्था के चाँद सीमित बिंदुओं में,
सत्य ख़ुद का ही बवंडर बन गया!
प्रेम के बंधन बँधे हैं रबड़-जैसे,
पास होकर दूर कोई कर गया...
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शिव प्रकाश मिश्र
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