Tuesday, February 23, 2016

कोई ख़यालों में क्यों... नहीं... होता...?


कोई ख़यालों में क्यों... नहीं... होता...?

— शिव प्रकाश मिश्रा (मूल कृति: फ़रवरी १९८०)

आसमाँ क्यों नहीं झुकता,

 समंदर क्यों नहीं थमता? 

प्रेम का अंकुर पनप कर, 

हिमालय क्यों नहीं होता?


चाँदनी मन में खटकती,

 हवा तन-मन को झुलसाती,

 कूक कोयल की न भाए, 

मेघ सावन में रुलाएँ, 

कोई भी मौसम यहाँ पर,

 सुहाना क्यों नहीं होता?


पंथ लंबा, भ्रमित राही,

दर्द बनकर घटा छाई, 

उष्ण बालू, फटे छाले, 

कौन पीड़ा को सँभाले? 

कोई भी अपना यहाँ पर, 

अपना क्यों नहीं होता?


नेह के बंधन जटिल हैं, 

नीड़ में पंछी विकल है,

 ज़िंदगी का क्या ठिकाना

, खो गया है आशियाना,

 प्रेम का आँचल यहाँ पर,

 बसेरा क्यों नहीं होता?


नींद पलकों में नहीं है, 

न कोई ख़्वाब, न इंतज़ार, 

मन है व्याकुल, तन सुलगता,

 दिल बहकता बार-बार, 

कोई आकर ख़यालों में, 

हमारा क्यों नहीं होता?



***** शिव प्रकाश मिश्र******
       मूल कृति फरबरी 1980

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