Sunday, July 19, 2026

भीग जाना चाहिए... (गीत)

 

भीग जाना चाहिए...  (गीत)

— शिव प्रकाश मिश्र


कड़कती सर्दी हो, धधकती गर्मी हो,

आँधी हो या फिर तूफ़ान हो,

सावधानी से जीना अच्छी बात है...

मगर जब सावन की बहार हो,

रिमझिम-सी फुहार हो,

मन का सूना आँगन भी गुलज़ार हो...

तो फिर भीग जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।

 

हर पल सहमे-सहमे जीना,

जीवन की पहचान नहीं।

सिर्फ़ साँसों का बोझ उठाना,

जीने का सम्मान नहीं।

अनजानी राहों में,

संघर्ष की बाँहों में,

संभलकर चलना अच्छी बात है...

मगर जब दिल आवाज़ लगाए,

सपना सच होने को आए...

तो फिर दौड़ जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।



मगर जब सावन की बहार हो...

रिमझिम-सी फुहार हो...

मन का सूना आँगन भी गुलज़ार हो...

तो फिर भीग जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


हर लम्हे का कोई तर्क नहीं,

हर सपने का कोई मोल नहीं।

जो अपने दिल की सुन न सके,

उससे बड़ा कोई शोर नहीं।

वक़्त के थपेड़ों में,

जीवन के झमेलों में,

चुप रह जाना अच्छी बात है...

मगर जब अपनों की दरकार हो,

रिश्तों को बस प्यार हो...

तो फिर झुक जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


दीपक आँधी से लड़ता है,

नदी चट्टानों को चीर निकलती है।

जो जोखिम से नाता रखते,

मंज़िल उनके कदम चूमती है।

पथरीली राहों में,

अँधेरी रातों में,

सतर्क रहना अच्छी बात है...

मगर जब उम्मीद का सूरज हो,

जीवन का एक  नया सवेरा  हो...

तो फिर मुस्कुराना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


सर्द हवाएँ थम जाती हैं,

पतझड़ भी बीत ही जाता है।

जो जड़ों से जुड़े रहते हैं,

उनका जीवन खिल जाता है।

अपने दायरों में,

अपने फैसलों में,

संतुलित रहना अच्छी बात है...

मगर जब ख़ुशियों का मौसम हो,

प्यार का पहला आलम हो...

तो फिर बाँहें फैलाकर

झूम जाना चाहिए,

खुलकर जी जाना चाहिए।


हर पल बचते रहना भी

कोई जीना नहीं होता।

कुछ बारिशें भी ऐसी  होती हैं,

जो भीगने के लिए ही आती हैं।

कुछ रिश्ते झुकने से बचते हैं।

कुछ सपने दौड़ने से मिलते हैं।

कुछ मंज़िलें मुस्कुराने से मिलती हैं।

और...

कुछ ज़िंदगियाँ

दिल खोलकर जीने से बनती हैं।

इसलिए...

जब सावन की बहार हो,

रिमझिम-सी फुहार हो,

मन में प्रेम का विस्तार हो...

तो फिर भीग जाना चाहिए...

खुलकर जी जाना चाहिए...

दिल से जी जाना चाहिए...

~~शिव मिश्रा ~~~

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