ग़ज़ल
आसान नहीं होते
— शिव प्रकाश मिश्रा
रिश्ते प्यार के और रास्ते पहाड़ के,
यारो, कभी भी आसान नहीं होते।
कभी आँधी, कभी तूफ़ाँ, कभी धूप, कभी छाँव,
हर सफ़र के सभी मौसम मेहरबान नहीं होते।
बरसों की बर्फ़ पिघले तो कहीं राह निकलती है,
दिलों के फ़ासले यूँ ही दरमियान नहीं होते।
पगडंडियाँ ही अक्सर चोटी तक पहुँचाती हैं,
हर रास्ते के हिस्से कारवाँ नहीं होते।
चट्टानें चुप हैं, इसका ये मतलब नहीं यारो,
पहाड़ों के भी सीने बेज़ुबान नहीं होते।
जो साथ चल न पाए, उसे इल्ज़ाम क्या देना,
हर पाँव के मुक़द्दर एक समान नहीं होते।
मोहब्बत इश्क़ है, सौदा नहीं ऐ अहल-ए-दुनिया,
दिलों के बीच रिश्ते कारख़ान नहीं होते।
कभी ख़ुद को भी रिश्तों की तराज़ू में रख लेना,
हमेशा दूसरे ही बदगुमान नहीं होते।
जो ख़ामोश हैं, ज़रूरी नहीं बेज़ुबाँ ही हों,
समंदरों के हर पल तूफ़ान नहीं होते।
जो दिख रहा है वही सच हो, ज़रूरी तो नहीं यारो,
हर मुस्कुराते चेहरे शादमान नहीं होते।
रिश्तों की हिफ़ाज़त में कई मौसम गुज़रते हैं,
मकाँ बन तो बहुत जाते हैं, लेकिन घर नहीं होते।
दिल बहुत बोझिल है, फिर भी यही ग़नीमत है,
पत्थरों के शहर में सब पत्थर-दिल इंसान नहीं होते।
मक़ता
'शिव' रिश्ते भी पहाड़ों की तरह होते हैं,
दूर से जितने सरल दिखें, उतने आसान नहीं होते।
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