Monday, June 22, 2026

"जो समझे तो जीवन हूँ"

 "जो समझे तो जीवन हूँ"

 — शिव प्रकाश मिश्रा

(मूल कृति : जुलाई १९८०) 

 

छोड़ दो अब साथ मेरा, बुझता एक चिराग़ हूँ मैं,

 नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं।


यही दुर्भाग्य है मेरा, काम न आ सका मैं तेरे, 

दुःख और दर्द के सिवा, क्या था भला पास मेरे।

आज चाहो तो मुझे अंतिम मधुर मुस्कान दे दो, 

या जो किसी को न दिया, वह अपमान दे दो। 

अँधेरी वादियों में भटकता विरह का राग हूँ मैं,

 नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (१)


आत्मा पर बोझ बनकर, चाहकर भी न बोल पाया, 

अंतस के घाव रिसते रहे, कोई भेद खोल न पाया। 

आज चाहे इस तपस्या का यहीं अवसान कर दो, 

कहूँगा कुछ नहीं, चाहे मुझे बदनाम कर दो।

 जो बुझ न सके कभी, ऐसी सुलगती आग हूँ मैं, 

नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (२)


कभी था महफ़िलों की शान, आज तन्हाई का साया हूँ,

 जिन्हें अपना समझा था कभी, उनसे ही धोखा खाया हूँ। 

मेरी ख़ामोशी को दुनिया ने 'हार' का नाम दिया,

मेरी सादगी का ज़माने ने कैसा सिला दिया।

 इस मतलबी ज़माने में, बस एक भूला ख़्वाब हूँ मैं, 

नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (३)


ठोकरों ने ही सिखाया, राह पर कैसे चला जाए, 

टूटकर बिखरे बिना भी, दर्द को कैसे जिया जाए। 

दुनिया ने जिन्हें दाग़ कहा, वही मेरी पहचान बने, 

वक़्त की धूप में तपकर, जीवन के वरदान बने। 

घावों से निखरा हुआ, अनुभव का अनुराग हूँ मैं,

 नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (४)


जो कल तक ज़ख़्म थे सीने में, आज हैं मेरी जागीर,

 अपने ही हाथों से बदली मैंने अपनी तक़दीर। 

संघर्षों की भट्टी में तपकर, ख़ुद को ऐसा ढाला है, 

अपनी डूबती हुई कश्ती को, ख़ुद ही आज सँभाला है।

 समय की हर चोट से उपजा, जीवन का विश्वास हूँ मैं, 

नहीं भाता किसी को, एक बदनुमा दाग़ हूँ मैं। (५)


अब न शिकवा है किसी से, न किसी से तंग हूँ मैं, 

उम्र की इस साँझ में, बस ख़ुद के ही संग हूँ मैं।

 बुझता चिराग़ नहीं अब, अनुभव का प्रकाश हूँ मैं, 

लंबी पीड़ा  से गुज़रकर, जगा नया विश्वास हूँ मैं। 


जो समझ सके तो जीवन हूँ, न समझे तो दाग़ हूँ मैं, 

अपने ही सच का साक्षी, और अपना अनुराग हूँ मैं। 

अब नहीं खलता मुझको यह बदनुमा दाग़ होना, 

इन्हीं दाग़ों की रोशनी से, चमका अपना भाग्य हूँ मैं

~~~~शिव मिश्रा ~~~~


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