भटकते हैं सभी, हर दिल को एक कंधे की चाहत है,
मगर अपना ही कंधा छोड़ देना एक आदत है।
समेटे क्यों कोई सुख-दुःख अकेला अपने ही भीतर,
ज़माने से छुपाना खुद को कैसी ये बगावत है?
जो अंकुर की तरह फूटे, बढ़े और दूर हो जाएँ,
ये रिश्तों का बिखराव तो पौधों की सियासत है।
जो सदियों से यहाँ मौजूद ही नहीं वजूद में अपने,
उसी इतिहास को दोहराना कैसी ये रिवायत है?
चले हैं 'शिव' जहाँ में ढूँढने हमदर्द को अपने,
मगर इस खालीपन में जीना भी तो इक इबादत है।
~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~
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