एक कंधे की चाहत
~ शिव प्रकाश मिश्रा
क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?
क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है?
भटकते हैं सब एक कंधे की चाहत में यहाँ,
पर अपना कंधा खाली रखने की आदत को न खोया है...
क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?
क्यों कोई नहीं चाहता सुख-दुःख स्वयं में समेटना,
गुमनामियों की चादरों में उम्र अपनी लपेटना।
रिश्ते न जाने कैसे अंकुरित होकर पनपते हैं,
समझें न हम इनको मगर, ये फिर भी अच्छे लगते हैं।
क्या इसीलिए इन रिश्तों का ये ताना-बाना पिरोया है?
क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है?
एक बीज जैसे थे हम जिसमें सब समाया था,
जड़, तने और पत्तों ने मिलके एक घर बनाया था।
बढ़ना मगर नियति थी पौधे की, सो दूर हो गए,
मंजिल की चाहत में सभी अपने वतन से खो गए।
जो साथ थे कल तक, उन्हें वक़्त ने ऐसा बिछोया है,
क्या कभी कोई अपनी ही गोद में सर रख के सोया है?
इतिहास का ये चक्र बार-बार क्यों दोहराता है?
जो है नहीं वजूद में, वो क्यों यहाँ सताता है?
शिव! ढूँढते हैं हमसफ़र पर खुद अकेले रह गए,
जज्बात के दरिया में सब खामोश होकर बह गए।
इस खालीपन के बीज को हर शख्स ने यहाँ बोया है...
क्या कभी कोई अपने ही कंधे पे सर रख के रोया है?
~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~
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