Sunday, June 21, 2026

"अपनी छाया से भी अक्सर डरते हैं लोग"


 अपनी छाया से डरते हैं लोग 

शिव प्रकाश मिश्रा 

(मूल कृति: जून १९८०)


ख़ुद मरने की मन्नत मांगते हैं लोग,

हँसते-हँसते भी रोते-से रहते हैं लोग।

सूना घर है कहीं, कोई रहने वाला नहीं,

 एक छत के लिए क्यों तरसते हैं लोग।

कोई अपना नहीं, कोई सपना नहीं,

कितने अपने भी सपने-से लगते हैं लोग।

 फ़ासले हैं बहुत, फिर भी लगते क़रीब,

कितने अपनों से दूरी बनाते हैं लोग।

 क्यों ज़नाज़ा उठा? जानते हैं सभी,

फिर भी मरने से कितना डरते हैं लोग।

ज़माने ! अब भला क्या भरोसा करें,

अपनी छाया से भी अक्सर डरते हैं लोग।

भीड़ में हर तरफ़ आदमी ही मिलें,

 फिर भी तन्हाइयों में सिमटते हैं लोग।

 हाथ मिलते हैं, दिल तक पहुँचते नहीं,

बस मुखौटों में रिश्ते निभाते हैं लोग।

जिसको सच मानकर उम्र भर पूजते,

वक़्त आने पर उसको भुलाते हैं लोग।

अपने ही आइनों से नज़रेँ चुराकर,

 ख़ुद से मिलने से भी कतराते हैं लोग।

प्यास दरिया की है, और दरिया उदास,

 फिर भी सागर की चाहत में बहते हैं लोग।

धूप सिर पर खड़ी, छाँव पास ही मगर,

 रेत के घर बनाकर बहलते हैं लोग।

एक पल की ख़ुशी के लिए रात-दिन,

सारी उम्र का चैन गँवाते हैं लोग।

जिसको पाकर भी हासिल नहीं कुछ हुआ,

 उसके पीछे ही जीवन बिताते हैं लोग।

नाम, दौलत, शोहरत की ऊँची उड़ान,

इन हवाओं में अक्सर उलझते हैं लोग।

मंज़िलों से अधिक रास्तों की थकन,

अपने कंधों पर ढोते ही रहते हैं लोग।

वक़्त की धूल चेहरों पर जमती रही,

फिर भी चेहरे नए-नए धरते हैं लोग।

दिल की बस्ती उजड़ती रहे तो रहे,

झूठ की रौशनी में सँवरते हैं लोग।

रात गहरी हो जब, डर भी बढ़ता है तब,

अपने साये को दुश्मन समझते हैं लोग।

एक आवाज़ भीतर से आती तो है,

 उसको सुनने से लेकिन बचते हैं लोग।

सच का दर्पण दिखाए जो तस्वीर को,

उस हक़ीक़त से ही आँखें चुराते हैं लोग।

 ख़ुद को पहचान लें तो बदल जाएँ सब,

इसलिए ख़ुद से ही दूर रहते हैं लोग।

देखकर दूसरों की बुझी सी शमा,

अपना दामन बचाकर निकलते हैं लोग।

दर्द बाँटें तो शायद हल्का हो सफ़र,

 दर्द को भी मगर राज़ रखते हैं लोग।

आँधियाँ जब कभी घर गिराती हैं यूँ,

तिनके-तिनके से फिर घर बनाते हैं लोग।

 टूट जाते हैं, बिखरते हैं सौ बार पर,

 जीने की ज़िद नहीं छोड़ते हैं लोग।

कौन किसका यहाँ, कौन किसके लिए,

 ये पहेली सदा ही बुझाते हैं लोग।

ज़िंदगी चार दिन की सराय ही सही,

 फिर भी सदियों का सामान रखते हैं लोग।

 कल जिन्हें भूल जाना है दुनिया को भी,

उन निशानों पर अभिमान करते हैं लोग।

ज़माने! अब शिव क्या भरोसा करे,

रंग मौसम के पल-पल बदलते हैं लोग।

ख़ुद मरने की मन्नत मनाते हैं लोग,

हँसते-हँसते भी रोते-से रहते हैं लोग।

और सबसे बड़ा सच यही है शायद

अपनी छाया से भी अक्सर डरते हैं लोग...॥


                    ~~~~शिव प्रकाश मिश्रा ~~~~~~


 


No comments:

Post a Comment